एक महाप्रतापी राजा जब कपटी मुनि की कुटिया में पहुंचे


हिमालय में एक महात्मा रहते थे ।
उनके शिष्य यहां, उन्होंने निवेदन किया - महाराज पधारो । महात्मा बोले - गर्मी के दिन है हिमालय में ही अच्छा होगा, हम सब इंतजाम करेंगे ।
संपन्न थे सेठ जी - गुरु जी आए और सेठ जी ने इतना इंतजाम कराया -- कमरा धूलवाओ, जल  भराओ,  तकत लगवाओ, बर्फ की सिल्लीयां  मंगवा दी और पंखा  चलाओ ।

 गुरुजी आए,  बड़े  प्रसन्न हुए  बोले वाह!
 सेठ का मुनीम था,  उसको लगा कि गुरुजी इतने प्रसन्न । तो उसने सोचा कि मैं लाख गरीब सही, चाहे कर्ज हो जाए, मैं भी अपने गुरु जी की ऐसी ही सेवा करूंगा ।
 भाव बढ़ा अच्छा !  पर एक गड़बड़ी हो गई ,  सेठ जी के गुरुजी आए जून में और मुनीम के गुरुजी आए जनवरी में । वह तो वैसे ही कांपते  आ रहे थे । 

     मुनीमजी ने कहा -- गुरुजी रुको !  कमरा धुलवाओ !!। गुरुजी ने सोचा शायद पवित्रता की दृष्टि से कर रहा होगा,, नै नै नै पानी भरवाओ, बर्फ मंगाऔ,  पंखा चलाओ ।
गुरुजी बोले - अरे क्या कर रहा है ! 
महाराज - मैं  गरीब सही, कर्ज हो जाए लेकिन सेवा वैसी ही करूंगा जैसी सेठ जी ने अपने गुरु जी की की थी । अब ऐसी व्यवस्था में गुरुजी रात भर रह जाऐं  तो सवेरे उठेंगे कि उठाना पड़ेगा, अरे समय का तो ध्यान रखें ।
इस प्रताप भानु के प्रसंग में केवल समय की बात है । समय वैसा अब समय ऐसा 
राजा प्रताप भानु
            चढ़पर बाज बार एक राजा, मृग आकर सुर साज समाजा |
 वन में गया,  सेना  साथ है,  वाराह दिखा,  मारने के लिए उद्यत ।
अरे यह देखना चाहिए कि सूर्य अस्ताचलगामी होने जा रहा है अब लौट चलें ।
             तदपि न मृग मग तजै नरेशू ।
वह सूर्य भगवान की ओर नहीं देख रहा । वह तो  अभी अपने स्वाभिमान के द्वारा संचालित होते हुए जा रहा है । अकेला पड़ गया , वाराह एक गुफा मे जाकर छुप गया । अब  कहां जाए 
 अब अंधेरे में इधर-उधर कपटी मुनि की कुटिया मिल गई ।  वो ही मुनि बना था कपटी, जो राजा से हार कर चला गया था ।  
        बेरी पुनी  क्षत्रिय पुनी राजा,   छल बल कीन्ह चाही निज काजा ।।
     वह प्रताप भानु को पहचान गया । प्रताप भानु नहीं पहचान सका ।  उसने पूछा कौन हो -  राजनीती के अनुसार प्रताप भानु ने अपना नाम छुपा लिया । राजा प्रताप भानु का मंत्री हूं । बस वह समझ गया कि हमें अपनी सिद्धि दिखा देने की जो अवसर की उपस्थिति हुई है,  मैं दिखाऊंगा ।
फिर वो पूछने लगा और महाराज कब से रहते हो ।कहां रहते हो । अब उसने जो  शुरू की बात , अरे हमारे बारे में मत पूछो- नहीं नहीं  महाराज फिर भी । अब तुम इतने प्रेम से कह रहे हो तो बताना ही पड़ेगा ।
           आदि सृष्टि उपजी जबहिं तब उत्तपत्ती भय मोही ।
      
           जब सृष्टि उत्पन्न हुई थी तब मैं उत्पन्न हुआ था । आज तक-  मरे नहीं !!  मृत्यू आयी   ही नहीं,  क्या करें ।
अरे महाराज 
नाम क्या है - अरे क्या करूं । 
नहीं फिर  नाम -- एक तनु । इसलिए मेरा नाम एक तनु है। 
 अब प्रताप भानु ने विश्वास कर लिया 
       सुख पाता रहा जो सदा जग में, आखिर में दु:ख पाना पड़ा ।
       पछताया नहीं जो कहीं भी कभी, उसे अंत समय पछताना पड़ा ।
       कोई फूल ना बाग में ऐसा खिला, खिलके न  जिसे मुरझाना पड़ा ।
       विधि का यह अटल विधान रहा जिसे आना पड़ा उसे जाना पड़ा ।
और यह कहता है हम गए नहीं ।

एक सज्जन ऐसे ही जो मन में आता सो  कहते और प्रचार कर रखा है कि  हम 400 साल के हैं, 400 वर्ष के हैं । सो ऐसे ही एक ओर   दूसरे सज्जन बड़े विनोदी थे । उनसे किसी ने कहा कि -  ये  400 साल के हैं, चार सौ वर्ष के । वो  विनोद करते हुए बोले -- होंगे 600 वर्ष से तो हम भी इन्हें ऐसे ही देख रहे हैं । अरे भाई --  नियम  ।  

     अब प्रताप भानु नियम की बात अगर करें -  तो उन्हें स्वीकार करना चाहिए,  लेकिन उन्होंने कहा कि महाराज - एक वरदान ।  यज्ञों से कुछ नहीं चाहा आज कितने निकल पड़े,  मन से  इच्छाएं । एक वरदान,  बोलो -- प्रताप भानु  ने मांगा कि बुढ़ापा ना आए,  बड़ा कष्ट होता है । महात्मा के पास कौन सी कमी है उसे देना  ही क्या था बोला  --- एवमस्तु, एसा ही हो, नहीं आएगा बुढ़ापा । अब बुढ़ापा जब आएगा तब आएगा अभी तो आ नहीं रहा है । महाराज बड़ी कृपा की बुढ़ापा नहीं आएगा,  आप ने कह दिया । लेकिन एक बात है,  क्या --- बुढ़ापा नहीं आएगा !! मृत्यू  तो आएगी । महात्मा बोले -- वो तो आयेगी । तो  यों  कहैं  ये तो श्राप  हो गया,  बुढ़ापे तक पहुंचे ही  नहीं जवानी में ही साफ।     
    जरा मरण!, मरण भी ना आए,  ठीक है- नहीं आएगा, मौत भी नहीं होगी,  इतना हमने कह दिया,  नहीं आएगी।
    दु:ख रहे तन सर्दी जुखाम,  बुखार,  डायबिटीज यह रोग, महात्मा बोले- नहीं नहीं नहीं कुछ नहीं, अच्छा ।
अच्छा! तो युद्ध में ना जीत पाए हमें कोई शत्रु ।         समर जितै  जनी कोई  
नहीं  होगा । 
   एक वरदान  और - एक छत्र हमारा राज रहे।  ठीक है । और शत्रु कोई नहीं रहे । 
     निपु हीन मही, राज कल्प शत हौऊ ।
 सो कल्पों तक हमारा राज्य हो । कितनी इक्छायें उत्पन्न हुई !!।
एक महात्मा कहते थे कि हम लोगों की दशा बड़ी विचित्र है ।
  चाह पैसों से आंनो में आती रही, चाह आंनो  से रुपया कमाती रही ।
  चाह रुपयों से नोट भूनाती रही, चाह नोटों से कोठी चुनाती रही । 
  चाहे कोठी में मोटर मंगाती रही,  चाह मोटर से होटल में जाती रही ।
  चाहे होटल में बोतल खोलाती रही, चाह क्या-क्या ना करती कराती रही ।
   अरे चाह पाली जिन्होंने वह पीले हुए और चाह छोड़ी जिन्होंने वह रसीले हुए ।
   और चाह जर से लगी जी  जरा हो गया,  चाह हरी से लगी जी हरा हो गया।
  और चाह उनकी हमको हरदम चाहिए और वह वो अगर चाहे तो फिर हमको क्या चाहिए । पर इतनी चाह, इतनी इच्छाऐं !!

 कपटीमुनी बोले -- ब्राह्मणों को वश में करो । उपाय मैं करूंगा । तुम्हारे पुरोहित का हरण करके लाउंगा । मैं 3 दिन बाद तुम्हारे पास पहुंचूगा ।
1 वर्ष तक का संकल्प करो, ब्राह्मणों को निमंत्रित करो और मैं जो भोजन बनाऊं,   तुम परासना  । सारे ब्राह्मण तुम्हारे बस में हो जाएंगे ।
    यह बड़ी अद्भुत कथा है । ब्राह्मणों के अनुसार चलना चाहिए कि ब्राह्मणों को अपने अनुसार चलाना चाहिए ।  जो ब्राह्मणों के अनुसार चलते हैं उनके निर्देशानुसार चलता है,  उनके जीवन रामत्व की प्राप्ति होती है । लेकिन जो ब्राह्मणों को अपने ढंग से चलाना चाहता है,  उनके द्वारा तो रावणतव ही प्रकट होगा ।
     प्रताप भानु में भी वही हुआ । चमत्कारिक राजा को वहां पहुंचा दिया  । 
चमत्कार दो सन्तो ने किया,  श्री हनुमान जी  ने एक चमत्कार किया और एक चमत्कार उस कपटी मुनी  ने किया ।
  चमत्कार देखने में तो एक जैसे लगते हैं,  हनुमान जी ने रातों-रात। वैद्य जी को  श्री राम जी तक पहुंचा दिया,  श्री लक्ष्मण जी मूर्छा के समय । ऐसा चमत्कार किया 
       आनेऊ भवन समेत तुरंता,   
    और राजा प्रताप भानु को बाज समेता  घर भेज दिया । 
   तो चमत्कार तो दोनों हुए लेकिन धन्य है वह चमत्कार जो व्यक्ति को राम से जोड़ दे । लेकिन  ऐसा चमत्कार किस काम का जो काम से जोड़ दे ।
    कपटी मुनि पद रहमति लीन्ही ।
    3 दिन बाद वही कालकेतु,  अच्छा देखो कितना अद्भुत है ! सत्यकेतु का बेटा,  कालकेतु के फेर में पड़ गया । समय की बात है ।
   भोजन बनाया,  परसने लगा तभी आकाशवाणी हुई-  ब्राह्मणों!  भोजन मत करना ।
    भइ रसोई भूल शुरु  मासो, सब जन उठे  मान विश्वासु । 
     श्राप दे दिया निशाचर हो ओ  तुम ।  
       ईश्वर राखे सिर धर्म हमारा ।

प्रताप भानू गये रसोई घर मैं, कोई नहीं है ।
मायामयी रसोई थी । वो सब प्रसंगमयी 
    सुरंग सुनामी ग्रसित पाई अगनी अकुलायी ।
ब्राह्मण ने कहा तुम्हारा दोष तो नही है। लेकिन भूपती भावी मिटयी नहीं। ये भावी तब्यता है । 
अच्छा प्रताप भानू के पूरे प्रसंग मे भावी तब्यता का वर्णन  है ।

उद्देश्य (प्रेरणा )

यह प्रसंग हमे सिखाता है कि भगवान कि  इच्छा मानकर किसी को दोष ना दें ।
प्रताप भानू पर चढ़ायी कि राजाओ ने, सारे भाई युध्द में वीर करणी करके, वीरगती को प्राप्त हुए। ओर यही रावण, कुम्भकरण और श्री विभिषण जी धर्म रुचि जो उनका मन्त्री था । वो विभिषण  के रूप मैं जन्म लेता है। अरीमर्दन कुम्भकरण के रूप में , प्रतापभानू  रावण के रूप मे ।

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