भगवान को गवाही देने जब कोर्ट में हाजिर होना पडा 40 वर्ष पूर्व की घटना || BHAGWAN ko GAWAHI DENE  JAB COURT ME HAJIR HONA PADA

           प्रिय पाठकों आज फिर हम आपके लिए लेकर आये हैं एक और Mythology Story जो कि ४० वर्ष पूर्व घाटी सच्ची घटना पर आधारित है।  यह पूर्णत: Devotional Story है। 

            Dear readers, today we have brought you another Mythology Story, which is based on the true story of the valley 60 years ago. This is a completely Devotional Story.



लगभग 40 वर्ष पूर्व की घटना है।

श्री धाम वृंदावन में एक संत घूमा करते थे ।

उन्हें देखकर लोग यह नहीं कहते थे कि महाराज जी आ रहे हैं,

संत जी आ रहे हैं, बाबा जी आ रहे हैं, ना । 

वह बस एक ही बात कहते थे---- "जज साहब आ रहे हैं" ।

उन्हें देखकर हर कोई कहता --- "जज साहब आ रहे हैं", जज साहब ।

एक महात्मा ने ऐसे ही पूछा कि- इनको "जज साहब" क्यों बोलते हैं ।

तो उन सन्त ने बड़ी अद्भुत बात बताई और बोले --- पहले यह कोर्ट में जज थे, अब महाराज बन गये परन्तु सभी लोग इनको जज साहब

के नाम से ही जानते हैं ।

दक्षिण भारत के किसी कस्बा नुमा छोटे से शहर में ये संत " जज " के पद पर थे।

और उसी शहर के पास छोटा सा गांव था ।

उस गांव में एक ' केवट ' रहता था ।

वह इतना सरल था, इतना सरल की कोई भी पूछता की केवट भैया-- वो बात कैसी है, वहाँ कया हो रहा है , फलाने के कया हाल हे ।

तो केवट कहता है - रघुनाथ जी जाने मैं तो कुछ नहीं जानता ।

इतना सरल लोगों ने उसका नाम रख दिया --- " भोला " ।

कोई कुछ भी पूछता-- वो यही जवाव देता, "भैया रघुनाथ जी जाने,", मैं तो नहीं जानता रघुनाथ जी जाने।

बस यही कहता ।

केवट के दो बेटे, एक बेटी थे ।

बेटी विवाह के योग्य, श्यानि हुई ।

तो बेटों ने कहा -- पिताजी; गांव के सेठ से पैसे उधार ले लें । बहन के विवाह के बाद चुका देंगे ।

हम लोग कमाई करके उधार चुकता कर देंगे।

पिताजी ने विचार किया, बोले --- ठीक है ।

केवट 'सेठ जी' के पास गया, 200 रूपये उधार ले लिये ।

ब्याज की दर तय हो गई ।

भाइयों ने बहन का विवाह किया ।

बेटी घर से विदा हुई, ससुराल के घर के लिए ।

अब 

केवट ने भी घर छोड़ दिया । और

श्री रघुनाथ जी के मंदिर में ही रहने लगा ।

बस उसके तो रघुनाथ जी ही सब कुछ 

जाऊं कहां तजि चरन तुम्हारे,

जाऊं कहां तजि चरन तुम्हारे ।

जाऊं कहां तजि चरन तुम्हारे ,

जाऊं कहां तजि चरन तुम्हारे ।

काको नाम पतित पावन जग ,

काको नाम पतित पावन जग ,

केही अति दीन प्यार ।

जाऊं कहां तजि चरन तुम्हारे ,

जाऊं कहां तजि चरन तुम्हारे ,

जाऊं कहां तजि चरन तुम्हारे ।


मंदिर में रहता, झाड़ू लगाता, रघुनाथ जी के दर्शन करता, आनंद से रहता ।

बेटों ने कमाई करके पैसा केवट को लाकर दिया ।

और बोले -- पिताजी; जिनसे उधार लिया है, ये रूपये उनको वापस कर दो ।

केवट गया ।

सेठ जी को रुपया वापस किया, ब्याज दिया । सेठ जी ने रसीद दी।

हिसाब-किताब चुकता किया, पाई पाई से पैसा प्राप्त, ऐसा रसीद पर लिख दिया । फिर 

सेठ केवट से बोला--- रसीद पढ़ो क्या लिखा है ?? 

केवट बोला --- मैं कुछ नहीं पढना जानता 'रघुनाथ जी जाने'।

सेठ के मन में पाप आ गया ।

बोला --यह रसीद हमें दे दो, यह कागज हमें दे दो, और पानी ले आओ ।

वह पानी लेने गया ।

सेठ ने कागज बदल दिया ।

और दूसरे कागज पर ऐसे ही कुछ लिखकर दे दिया ।

जो कागज लेकर आया उसमें ऐसे ही कुछ लिखा था ।

रघुनाथ के चरणों में रशीद समझकर रख दिया, फिर अपने कक्ष की अलमारी में रख दिया और प्रसन्न रहने लगा ।

सिर पर सीताराम फिकर फिर क्या करना 

सिर पर सीताराम फिकर फिर क्या करना 

क्या करना क्या करना फिकर फिर क्या करना 

क्या करना क्या करना फिकर फिर क्या करना 

सिर पर सीताराम फिकर फिर क्या करना

तेरे बिगड़े बनेंगे काम फिकर फिर क्या करना 

और पितु रघुवर श्री जानकी मैया 

और पितु रघुवर श्री जानकी मैया 

फिर क्यों परेशान ओ भैया 

फिर क्यों परेशान हो भैया ।

कटेंगे कष्ट तमाम फिकर फिर क्या करना 

सिर पर सीताराम फिकर फिर क्या करना 

सिर पर सीताराम फिकर फिर क्या करना । 

इसी भाव में रहता ।

केवट ने भगवान के भरोसे सब छोड़ दिया था ।

अब सेठ जी ने केवट के विरुद्ध मुकदमा दायर कर दिया और मुकदमा इन्हीं "जज साहब" की अदालत में आया ।

आप की अदालत में हा हा हा हा हा हा हा हा।

तारीख पर केवट उपस्थित हुआ ।

जज साहब ने कहा - केवट; तुमने सेठजी से रुपया उधार लिया था ??

हां हुजूर ! लिया था ।

दे दिया ???

हां दे दिया साहब ।

कोई प्रमाण है ???

यह रसीद ।

पर इससे तो सिद्ध नहीं होता कि तुमने रुपया दे दिया है ।

केवट रोने लगा हुजूर माई बाप ।

हमने तो इसे ही सब कुछ समझे थे ।

जज साहब को दया आने लगी ।

अच्छा रोओ मत, तुम यह बताओ जब तुमने सेठ जी को रुपया वापस दीया ।

तब तुम्हारे और सेठ जी के बीच में कोई और उपस्थित था ।

केवट उसी सहजता में बोला कि हमारे और सेठ जी के बीच में शिवा रघुनाथ जी के अलावा और कोई उपस्थित नहीं था।

उसने लिया पृभु श्री रघुनाथ जी का नाम और 

जज साहब ने समझा रघुनाथ जी इनके गांव में रहने वाले कोई सज्जन होंगे ।

बोले - तुम जाओ, अगली तारीख में आना।

जज साहब ने अपने खर्चे से समन जारी कर दिया, रघुनाथ जी के नाम पर ।

अब चपरासी पूरे गांव में घूमे ।

मजे की बात, रघुनाथ जी नाम का कोई आदमी ही नहीं था ।

किसी ने कहा, रघुनाथ जी का मंदिर जरूर है।

चपरासी बोला -- वही बताओ ।

मंदिर पर गया 

पुजारी जी बाहर बैठे सीताराम सीताराम सीताराम सीताराम कर रहे थे और 

जब चपरासी ने देखा

पुजारी से बोला --- रघुनाथ जी का मंदिर यही है ।

पुजारी जी बोले -- हां ।

तो बुलाओ 

पुजारी जी ने भी देखा और मन में सोचने लगे 

जब भगवान ने बुला ही लिया है तो हम वापस काहे करें ।

हस्ताक्षर पत्र पर हस्ताक्षर कर दिए ।

चपरासी समझा कि यही रघुनाथ जी हैं ।

समन रघुनाथ जी के चरणों में रखते हुए पुजारी जी ने कहा कि -- वाह !! प्रभु क्या लीला है! 

भक्त जो ना कराएं हो तो थोड़ा ।

आपके लिए पोशाक कई बार आई, हार कई बार आए ,अरे पेजनी करधनी कई वार आया मुकुट कई बार आया पर लेकिन समन पहली बार आया है ।

केवट से कहा कि तुमने रघुनाथ जी का नाम क्यों लिखा दिया वहां ।

केवट बोला जब सब जगह रहते हैं तो वहां भी थे ।

झूठा नाम काहे को लिखाया ।

अब रघुनाथ जी ही जाने ।


हरि बिन संकट कौन निवारे हैं 

हरि बिन संकट कौन निवारे है 

हरि बिन संकट कौन निवारे हैं 

हरि बिन संकट कौन निवारे है

साधन साधन ही मलिन दिन में 

जाऊं कहीं के द्वारे 

या अनाथ की नाल आज 

रघुनाथ जी हाथ तुम्हारे

रघुनाथ जी हाथ तुम्हारे 

हरि बिन संकट कौन हमारे 

हरि बिन संकट कौन बारे

एक भी भरोसा क्या आएगी 

लाज तुम्हारी जाय की 

लाज तुम्हारे नाथ 

मेरो का बिगड़े हो

जाएगी लाज तुम्हारी 

दीनदयाल तूने जब थे तब से

मन में कछु ऐसी बसी है 

जाऊं थैरू कहां और जाऊं कहां

बस तेरे ही नाम की फैट कैसी है 

तेरा ही आसरा एक मनु कहीं से

पूछो कोई और जस्सी मुरारी

पुकारी पुकारी 

कहीं मेरी हंसी नहीं तेरी हंसी नहीं तेरी हंसी है 

मेरी हंसी नहीं तेरी हंसी है 

जाएगी लाज तुम्हारी

नाक में रोका बिगड़े हो 

जाएगी लाज तुम्हारी 


वह निश्चिंत रहता ।

अब रात्रि कालीन मंदिर में झाड़ू लगाए, तो रघुनाथ जी की तरफ देखे।

बर्तन मांजे, तो रघुनाथ जी की तरफ देखे । 

जीवन ऐसा बस काम करते जाओ ।

तारीख के 1 दिन पहले पुजारी जी ने कहा कि केवट तुम जाओ अदालत में ताकि सही समय पर पहुंच सको ।

अब रही रघुनाथ जी के मन की तो रघुनाथ जी ही जाने ।

केवट तो प्रणाम करके चला गया ।

दूसरे दिन सवेरे सवेरे पुजारी जी ने जल्दी जाकर स्नान किया ।

भगवान को स्नान कराया, नई पोशाक पहनाई, बड़ी जल्दी कुछ बनाकर भगवान को भोग लगाया ।

सोच रहे थे आज भगवान को पहली बार बाहर जाना है ।

कपड़े अच्छे होना चाहिए ।

कुछ खा पी कर जाएंगे तो भूखे नहीं रहेंगे लेकिन आंखों में आंसू भर कर यही कहते --- जाइएगा जरूर, उसका आपके अलावा और कोई नहीं है ।

आँसू भरकर पुजारी जी प्रार्थना कर रहे हैं ।

केवट पहुंचा अदालत में जज साहब ने कहा केवट तुम्हारे गवाह कहां है केवट बोला हुजूर वह तो सब जगह रहते हैं यहीं कहीं होंगे

यहीं कहीं होंगे बुलाओ चपरासी को ।

आदेश हुआ ।

चपरासी ने आवाज लगाई -- रघुनाथ हाजिर हैं रघुनाथ हाजिर हैं रघुनाथ हाजिर हैं।

हाजिर है हाजिर है हाजिर हैं ।

ऐसे 3 नारे जो लगाए क्या देखा 

चाल लटपटे सी एक वृद्ध की झुकी सी दे 

लड़खड़ाते हुए एक बूढ़ा आदमी और लाठी देखते हुए आ रहा है ।

वहीं से इशारा कर रहा है आ रहा हूं आ रहा हूं ।

चाल अटपटी सी एक वृद्ध की झुकी सी देह

कुड़ी फटी सी दे हाथ में है चढ़ी पड़ी तुलसी की देखभाल माथे पर रोली चार चंदन चढ़ाए हैं ।

साहब के सामने विनीता चपरासी साथ आज रघुनाथ जो गवाह बन कर आए हैं ।

साहब के सामने राष्ट्रपति जी गवाह बन कर आए हैं ।

केवट ने अपने नाम कर लिया सेठ जी चौके किए कौन ।

जज साहब ने कहा रघुनाथ जी आपका ही नाम है ।

जी केवट ने रुपया वापस कर दिया -- हां ।

कोई प्रमाण हे सेठ जी ने खुद रसीद एंड लिख ली थी ।

बेईमानी आ गई मन में दी नहीं।

सेठ जी इनको केवट को सैटरडे को नहीं रख दे जाए।

उनकी बैठक में रखे हुए रजिस्टर को बुलवाकर मंगाया जाए ।

उस रजिस्टर में रसीद अब तक सुरक्षित है ।

सर्वांतर्यामी भगवान से क्या छुप सकता है।

चपरासी को भेजा गया रजिस्टर मंगाया गया ।

वह रसीद मिल गई ।

सेठ जी दंडित हुए ।

केवट बाइज्जत बरी हुआ ।

गवाह महाराज तो चले ही गए थे 

जज साहब तो चले ही गए थे गवाह है तो चले ही गए थे ।

केवट को जैसा अपने अपने चेंबर में बुलाया ।

केवट एक बात पूछे ।

हां पूछिए हुजूर कि रघुनाथ जी कहां रहते हैं।

केवट ने कहा हुजूर जहां हम रहते हैं ।

तो तुम कहां रहते हो ?।

कहां जहां रघुनाथ जी रहते हैं ।

तो तुम एक ही गांव के रहने वाले हो ?

अरे गांव हम तो एक ही जगह के रहने वाले हैं ।

एक ही जगह के ????

कौन है यह तुम्हारे गांव के ???

अरे सरकार पढ़े लिखे लोगों को समझाना बड़ा मुश्किल होता है ।

अरे यह वह है जिन का मंदिर है ।

मंदिर के पुजारी तो लग नहीं रहे थे और मंदिर यह बनवा दे ऐसी हैसियत भी नहीं लग रही थी ।

केवट ने कहा हुजूर यह वही है जो मंदिर में बैठे हुए हैं, मंदिर में विराजमान हैं ।

यह अब जज साहब क्यों के चपरासी को बुलाया ।

चपरासी कहां पर आता है ।

जो जिस आदमी को हस्ताक्षर किए थे वह यह नहीं था ।

जब सारा रहस्य पता लगा तब जज साहब रोने लगे 

रोते-रोते बंगले पर गए लोगों ने पूछा कि क्या बात है ।

रो क्यों रहे हो तो उन्होंने यही कहा 

सुखसागर नारद शेष गणेश उत्सव 

सुख शरद नारद शेष गणेश अब 

सब ध्यान में आते रहे सॉरी 

आज विनीत अदालत मैं केवल के गवाह कहा कहते रहे 

जो सुख शंकर जी के ध्यान में नहीं आएंगे ।

भगवान भगवान आज केवट की गवाही देते रहे। 

तो किसी ने कहा कि आप रोते क्यों हैं खुश होना चाहिए अब गए तो दुख क्या ।

वह तो जाते ही सुखदेव के अंदर दिए को भाई दुख ना ही तुझको जाते रहे दुख तो केवल एक बात का है बड़ी बेरहमी हो गई विरुद्ध कुर्सी पर बना जज बैठा रहा जगदीश खड़े समझाते रहे 


मैं कुर्सी पर जज बना बैठा रहा और जिन की अदालत में 1 दिन सबको उपस्थित होना पड़ेगा रे भगवान खड़े-खड़े गवाही देते रहे ऐसे भगवान ऐसा भाव भरा रोते रहे पर से पद से इस्तीफा दे दिया साधु बनकर वृंदावन आ गए वृंदावन आकर भी भगवान के मंदिर के अंदर नहीं जाते थे सड़क पर ही और बाहर से ही सड़क पर नाते की सड़क की धूल माथे पर चढ़ा लेते थे क्यों यही सोचते थे 

आ तो गया हूं मगर जानता ता हूं तेरे दर पर आने के काबिल नहीं हूं

आ तो गया हूं मगर जानता हूं तेरे दर पर आने के काबिल नहीं हूं

आ तो गया हूं मगर जानता हूं तेरे दर पर आने के काबिल नहीं मेहरबानी ऊंची इतनी की चीज उठाने के काबिल नहीं हूं तेरी मेहरबानी ऊंची इतनी की चीज उठाने के काबिल नहीं है 

आ तो गया मगर जानता हूं 

जमाने की चाहत ने मुझको बुलाया मेरे नाम जाने की

जमाने की चाहत ने मुझको बुलाया तेरे नाम तेरा नाम मेरी जुबां पर ना आया 

खता बार हूं मैं गुनहगार हूं मैं तुझे मुंह दिखाने के काबिल नहीं हूं

आ तो गया हूं मगर जानता हूं कहीं मुंह दिखाने के काबिल नहीं है माना कि दाता हो तुम कुल जहां के मगर कैसे दामन फैलाऊ आकर, जो अब तक दिया है वही कम नहीं है ।

जो अब तक दिया है वही कम नहीं है कर्जा चुकाने के काबिल नहीं हूं यह कर्जा चुकाने के काबिल नहीं 

आ तो गया हूं मगर जानता हूं तेरे दर पर मुंह दिखाने के काबिल नहीं है

40 वर्ष पहले ब्रिज भी थी उन्हें उनका दर्शन होता था मगर यह सच्ची घटना है और इस युग की घटना है। 

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Conclusion 

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