चोर, भक्त और भगवान का हास्य विषय

Humor theme of the thief, devotee, and god



लोग कहते हैं सच्चे गुरु मिले, हम कहते है कि श्रद्धा सच्ची हो ।
एक राजा की बेटी नाम था --- वैराग्यवती ।
बचपन से ही वैराग्य की बातें किया करती थी ।
उसकी बातों को और उसके आचरण को देखकर राजा ने एकांत में उसको रहने के लिये एक भवन दे दिया, ताकी वो आराम से अपना भजन कर सके । अब जब अकेली रह्ती तो 

वह जब भी फूलों को देखती तो कहती --- 

आज खिले कल झुक चले, परसों मिलके धूल ।
देख दशा यू फूल की, फिर क्यों फूलत फूल ।।

कभी कहती है कि वृक्ष और पत्ते बात कर रहे हैं ।

पत्ता बोला वृक्ष से सुनो वृक्ष वनराज,
अब के बिछड़े कब मिले दूर गिरें है जात ।
तरुवर बोला पात से सुनो पात मम बात 
हर घर की यह रीति है एक आवत एक जात ।
एसी बातें करती बस और अकेले में रहती ।

एक दिन रात्रि का प्रथम पहर शुरू हुआ और वह बैठी बैठी गीत गा रही थी।
हम देखत सब जग गयौ, जग देखत हम जाएं ।
एसो सतगुरु ना मिलयो पगड़ी छुड़ावे बांह ।।
रहना नहीं देस बिराना है 
रहना नहीं देस बिराना है
यह संसार नाव कागज की 
यह संसार नाव कागज की 
बूंद पड़े घुल जाना है
बूंद पड़े घुल जाना है 
रहना नहीं देस बिराना है ,
ओ ओओ रहना नहीं देस बिराना है ।
कहत कबीर सुनोओ भाई साधु , 
कहत कबीर सुनोओ भाई साधु ।
सतगुरु नाम ठिकाना है ,
सतगुरु नाम ठिकाना है ।
मोहे लागी लगन गुरु चरणन की , 
मोहे लागी लगन गुरु चरणन की ।
एसो सतगुरु ना मिलौ ।

ये गीत गा रही थी वैराग्यवती ।

अब उसके भवन के पीछे एक चोर नकब लगा रहा था ।
उसने सुना, तो सोचा, इस राजकुमारी को तो सतगुरु की आवश्यकता है । क्यो न मैं ही बाबा बनकर इसके पास जाऊ ।
सो वह बाबा बन गया ।
अच्छा देखो !!
बाबाजी होने में कठिनाई है, बनने में कौन सी कठिनाई है ।
घर में हुई खटपट, चलो गुरु जी के मठ पर ।
गुरुजी ने काटी चोटी, मांग खा बेटा रोटी ।।

सो वह बबाजी बन गया।
एक और बात 
देखो जब हम लोग संत बनते हैं तब मुढ़ते हैं ।
हम लोग साधु बनते हैं, तो गुरु जी हमें मुड़ते हैं ।
गुरुजी ने जैसा मोड़ा, वैसे मुड़ गए।
अर्थात जगत से जगदीश्वर की ओर मुड़ गए ।
प्रपंच से परमार्थ की ओर मुड़ गए ।
असत्य से सत्य की ओर मुड़ गए ।
इसलिए मुड़ गए ।
तीर्थ में जाएं तो जरूर मुड़े ।

हमारे एक परिचित सज्जन हैं उन्हें हम अच्छी तरह जानते हैं ।
पर वो सप्ताह में दो बार मुड़ते हैं ।
पर आज तक नहीं मुड़े ।

सुनने को भी बढ़िया मिले ।लोग कहें --महाराज ।
तो बनने में क्या कठिनाई है ?
बन गए ।
और बाबाजी बनकर सतगुरु रूप बनाकर, वैराग्यवती के सामने गये । 
वैराग्यवती ने देखा - नारायण हरि का कीर्तन कर रहे हैं कोई रात्रि के समय । 
बोली !
महाराज-- प्रणाम ।
लो जल पियो ।
हां हम प्यासे हैं, जल पिलाओ ।
लेकिन सुनो सुनो --- तुमने दीक्षा ली है ???
नहीं दीक्षा नहीं ली ।
तब हम तुम्हारे हाथ का पानी नहीं पी सकते ।
जिसने दीक्षा नहीं ली उसके हाथ का पानी क्या पीना ।
जाने लगे ।
वैराग्यवती ने कहा कि ---जाओ मत ।

आप ही दीक्षा दे दो मुझे, ताकि मैं आपको जल पिला सकूँ ।
बोला - हम विरक्तो की दीक्षा ऐसे घरौं में नहीं देते ।
जंगल में चलो ।
वैराग्यवती ने कहा--- मेरा तो कल्याण हो।
मैं जंगल में चलने को तैयार हूं ।
अच्छा अच्छा ठीक है।
आभूषण रुपया पैसा गहना सब रख लेना ।
राजकुमारी ने सब रख लिया और संत के साथ चल दिए ।
उस तथाकथित संत के साथ जो संत था ही नहीं ।
घोर जंगल में जाकर उसने बैरागयवती को एक वृक्ष से बांध दिया ।
वृक्ष के किनारे खड़ी करके रस्सी चारों तरफ से लपेटी । बाँधा ।
और बोला -- देख यह गुरु जी का बांधा हुआ बंधन है ।
हम सात दिन बाद आकर खोलेंगे ।
यहीं बंधी रहना।
हो सकता है हम जल्दी आ जाएं , परसों ही आकर खोल दें।
वह बोली -- ठीक है गुरुजी ।
और वह सब रुपया गहना पैसा जेबर सब लेकर चला गया ।
अब वह काहे को आने वाला था ।
वह नहीं आया ।
दूसरे दिन राजा ने देखा कि वैराग्यवती का पता नहीं ।
राजा दूसरे दिन अपने घोड़े पर सवार होकर सब जगह वैराग्य्वती को खोजते हुए गया ।
वृक्ष से बंधी हुई बेटी को देखकर कहा - बेटी ! तुम्हे यह कौन बांध गया है ?
वैराग्यवती ने कहा कि -- मेरे गुरुदेव ने बांधा है ।
राजा ने कहा--- पगली गुरु लोग ऐसा नहीं करते ।
कोई छद्म वेश धारी तुम्हें ठग कर गया है।
ला मैं तुझे बंधन से मुक्त करूं, घर चल मेरे साथ ।
वैराग्यवती ने कहा -- पिताजी आप को प्रणाम है ।
पर गुरुजी का बांधा हुआ बंधन नहीं खुलवाओ ।
राजा ने बहुत समझाया पर नहीं मानी ।
तो कहा --- बंधी रहे !! यहां ।
राजा भी चला गया ।
दो दिन हो गए, भगवान नारायण जी का आसन डोलने लगा ।
नारदजी से कहा -- पता लगाओ ।
नारदजी आए - जो देखा कि यह बंधी हुई है ।
अरे अरे अरे 
नारायण नारायण करते हुए बोले -- बेटी किसने बांधा तुम्हें ।
मैं तुम्हें बंधन से मुक्त कर देता हूं ।
तुम मुझे जानती हो ।
बोली -- हां ।
प्रणाम किया बेटी ने ।
बोली --- आप देव ऋषि नारद हैं, मैं तुम्हें प्रणाम करती हूं ।
अरे तुम्हें कोई ठग बांध गया है।
मैं खोलता हूं तुम्हें रस्सी से।
मुक्त हो जाओ ।
बोली --- महाराज आप देव ऋषि हैं, मैं आपको प्रणाम करती हूं, लेकिन गुरुजी का बांधा हुआ बंधन नहीं खुलवाऊंगी ।
अरे गुरुजी !! काहे के गुरुजी !!
वह तुम्हें बांध कर चले गए ।
वह बोली -- उनके बंधन की यही तो महिमा है कि दूसरे तीसरे दिन ही आपका दर्शन हो गया ।
अगर वह ना बांध कर गए होते तो आप का दर्शन होता ???
अब वह ना माने ।
नारदजी गए भगवान के पास कि-- प्रभु चलो ।
भगवान स्वयं आए ।
भगवान नारायण चतुर्भुजी रूप मंद मंद मुस्कुराते हुए भगवान ने कहा कि --- बेटी मैं भगवान नारायण हूं ।
मैं तुम्हें बंधन से मुक्त कर देता हूं ।
मेरे दर्शन के लिए ही सारी साधनाएं की जाती हैं ।
तुम्हें जो बांध गए हैं वह अच्छे व्यक्ति नहीं मालूम पड़ते ।
मैं तुम्हें बंधन से मुक्त कर देता हूं ।
पर वैराग्यवती बोली --- प्रभु क्षमा करें !! आपका दर्शन हुआ ।
आपको मैं बार-बार प्रणाम कर रही हूं पर, गुरुदेव का बांधा हुआ बंधन तो उन्हीं से खुलवाऊगी।
भगवान जी भी हार गए ।
नारद जी से बोले --- नारदजी ! इनके गुरुजी का पता करो, कहाँ हैं वो । पता लगाओ ।
नारद जी ने कहा कि--- प्रभु क्या ठिकाना !!
बोले --- कहीं ना कहीं तो मिल ही जाएंगे ।
कहीं ना कहीं नकब लगाते हुए मिल ही जाएंगे । ढूंढो !
नारद जी गए ।
सचमुच वह चोर एक घर के पीछे नकब लगा रहा था ।
तब तक नारद जी ने कहा --- नारायण ! नारायण !!
चौक कर देखा !!! 
नारद जी मुस्कुराए ।
बोले--- चलो भगवान जी बुला रहे हैं।
बोले-- हमें और भगवान जी बुलाएं ।
मैं तो जन्म का चोर हूं ।
नारद जी ने कहा कि -- तुम जिस शिष्या को बांध आए, उसे बंधन से मुक्त करो ।
भगवान जी वहीं खड़े हैं ।
बेचारा सकुचाते हुए आया।
गया !! सिर नीचे किए हुए -- भगवान को प्रणाम किया ।
भगवान बोले--- गुरुदेव !! शिष्या को बंधन से मुक्त करो ।
बेचारे ने लजाते हुए बड़े संकोच से रस्सी खोली ।
पर वैराग्यवती जैसे ही अलग आकर खड़ी हुई ।
उसने हाथ जोड़े ।
किसके ??
कहे ; 
गुरु गोविंद दोनों खड़े, काके लागूं पाय ।
बलिहारी गुरुदेव की जिन गोविंद दिए मिलाएं ।
तो यह है 
वैराग्यवती की सच्ची श्रद्धा । तो गुरुदेव की महिमा तो अपार है ।

लेकिन अगर सच्ची श्रद्धा हो, तो द्रोणाचार्य से एकलव्य बाणविद्या द्रोणाचार्य की मूर्ति से सीख सकते हैं ।
तो गुरुदेव के प्रति सच्ची श्रद्धा जीवन मे क्या चमत्कार नहीं करती ।
इसलिए
। श्रद्धा वान लभते ज्ञानम् ।
पर इस कथा का उद्देश्य यह नहीं है कि गुरुदेव ऐसे ही होना चाहिए । अपनी श्रद्धा सच्ची होनी चाहिए ।
और भगवान की कृपा से हमें गुरुदेव मिलें ।
और हां 
गुरुदेव का द्वार है, दीवार नहीं है।
दीवार और द्वार में ज्यादा अंतर नहीं है ।
दीवार में से कुछ निकाल दो तो दीवार ही द्वार है ।
और द्वार में कुछ लगा दो तो द्वार ही दीवार है ।

जिनके पास अहंकार का कुछ लगा है, द्वार ही दीवार बन गया है
और अहंकार का कुछ निकल गया तो दीवार ही द्वार बन गई है ।

अपनी खुदी ही पर्दा है दीदार के लिए वर्ना,
अपना कोई नकाब नहीं यार के लिए ।
इसलिए भाई, जो भगवान के रंग में रंगे हुए हैं ।
जो भगवान से अभिन्न हो गए हो ।
ऐसे गुरुदेव की शरण, श्रद्धा पूर्वक लैं।

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