जब गणेशजी को भोग नहीं खाने दिया || Jab Ganesh Jii Ko Bhog Nahi Khane Diya

Introduction

आज हम आपको Ganesh Chaturthi 2020 के  उपलक्ष्य में  आपके लिए एक और Story आये हैं, जो कि एक हास्य से परिपूर्ण कथा है।  Happy Ganeshotsav to all.





आज हम जिन भक्त की कथा बताने जा रहे हैं वह बड़ी दिव्य है, और संपूर्ण कथा हास्य से संपूर्ण है ।

बिहार के एक छोटे से गांव में ब्राह्मण परिवार के अंतर्गत भक्त श्री

दीनानाथजी का जन्म हुआ ।

दीनानाथ जी इतने सच्चे और सरल भक्त थे कि अपना अधिक से अधिक समय भगवान शंकरजी के मंदिर में ही व्यतीत करते थे।

और भगवान शंकरजी से इनका इतना अधिक प्रेम था कि बार-बार किसी ना किसी बात पर भगवान को ही डांटते रहते थे और भगवान गणेश जी के साथ तो इनका झगड़ा चलता ही रहता था।

इसका भी एक गहरा रहस्य है जो कि बताया जाएगा ।

ब्राह्मण कुल में उनका जन्म हुआ, बचपन से ही परमात्मा की भक्ति का उनको विशेष लगाव था ।

शुरुआत में तो शादी का विचार बिल्कुल नहीं था पर माता-पिता की आज्ञा मानकर उन्होंने शादी करना स्वीकार कर लिया ।

अब उमा नाम की ही एक सुशील और सुंदर कन्या के साथ उनका विवाह हो गया ।

उमा भी बड़ी ही सीधीसादी और सच्ची थी, परमात्मा की बड़ी सेविका थी ।

जब दोनों को एक दूसरे का साथ मिला तो इन दोनों की भक्ती और प्रबल हो गई ।

शादी के प्रथम दिवस दीनानाथ जी ने अपनी पत्नी से कहा --- तुम्हें पता है, मेरा मन तो शादी का था ही नहीं पर मैंने, मेरे माता-पिता की आज्ञा मानकर विवाह का प्रस्ताव मंजूर किया, क्योंकि मेरा मन तो शुरुआत से ही परमात्मा के श्रीचरणों से युक्त था ।

इसलिए मुझे संसार के कार्यों के प्रति कोई मोह है ही नहीं ।

मैं तुम्हारा पालन पोषण भी ठीक से नहीं कर पाऊंगा ।

हां पर एक बात अवश्य है --- तुम मुझे जो भी कार्य कहोगी मैं परमात्मा से निवेदन करूंगा परमात्मा तुम्है कभी निराश नहीं करेंगे ।

इससे अधिक तुम मुझसे अधिक उम्मीद नहीं रखना ।

उमा भी सच्ची धर्म निष्ठ धर्मपत्नी थी ।

उसने अपने पति की आज्ञा को स्वीकार किया ।

दिन व्यतीत होने लगे ।

दीनानाथ जी का तो नियम था कि अपने घर के नजदीक एक भगवान शंकर जी का शिवालय था । प्रातः काल वहां चले जाते थे और रात्रि के समय लौटते ।

उनकी धर्मपत्नी उमा को किसी चीज की आवश्यकता पड़ती तो वह अगर पतिदेव से कहती कि घर में इन सामानों की आवश्यकता है तो दीनानाथ जी बोलते कि -- मुझे कागज पर लिख कर दे दो, और वह कागज, जाकर दीनानाथ जी मंदिर में भगवान शंकरजी के नजदीक रख देते थे और उनसे कह देते ---- आज घर में इन चीजों की आवश्यकता है, भेज देना ।

अब जैसे ही दीनानाथ जी ऐसे बोलते भगवान भी उनकी आज्ञा स्वीकार कर लेते थे ।

किसी ना किसी रूप में कागज में लिखी सारी वस्तुओं को दनीानाथ जी के घर में पहुंचा देते थे ।

इस प्रकार दिनानाथ जी का विश्वास भगवान परमात्मा की ओर बढ़ता ही गया ।

अब सारा दिन भगवान शंकर जी की सेवा करें ।

मंदिर में जितने भी भक्त आऐं वह दीनानाथ जी को भगत जी के नाम से पुकारते थे 

अब दिनानाथ जी का भगवान शंकर से तो विशेष प्रेम था पर भगवान गणेश जी के साथ उनका वाद-विवाद तो चलता ही रहता था ।

उसका कारण यह था कि जब दीनानाथ जी के पास कोई भी भक्त आकर कहता कि --- है ब्राह्मण देवता हम यह प्रसाद लेकर आए हैं, इनका भोग लगा दो, तो आश्चर्यजनक घटना घटती ।

जब दीनानाथ जी, प्रसाद को भगवान शंकरजी के आगे रखते तो शंकरजी उसमें से कुछ लेते नहीं थे पर जैसे ही वो प्रसाद गणेशजी के आगे रखा जाता था, वह गायब हो जाता था ।

दीनानाथ जी हैरान होकर कहते कि यह अजीब है । 

मैं यह प्रसाद रखता हूं और तुम खा जाते हो, हमें कुछ मिलता ही नहीं, खाने को ।

पहले ही बहुत परेशानी होती है और भक्त लोग भी इतने समर्थ और

संपन्न नहीं है कि मुझे कुछ देकर जाए ।

जो कुछ थोड़ा बहुत मिलता है उसमें से भी गणेश जी सब गायब कर देते हैं।

इस प्रकार उनका वाद-विवाद चलता ही रहता था ।

अब एक दिन जीवन में एक घटना घटित होने वाली थी ।

धीरे-धीरे दीनानाथ जी की पुत्री बड़ी हुई ।

आज जैसे ही दीनानाथ जी घर पहुंचे ।

दिनानाथ जी की धर्मपत्नी ने कहा--- हमारी पुत्री के विवाह का प्रस्ताव आया है, आपको उसके विवाह के बारे में कुछ सोचना पड़ेगा ।

भगतजी ने कहा --- इसमें सोचने की क्या आवश्यकता है !!;

वह भगवान शिव की कन्या है, भगवान शिव ही कन्यादान करेंगे ।

अब वह भी समझ गई कि मेरे पतिदेव तो कुछ करने वाले ही नहीं है, तो उसने अपनी कोशिश की ।

गाँव के समीप ही एक अन्य गाँव था ।

उस गांव के एक संपन्न परिवार के साथ अपनी पुत्री का विवाह निश्चित कर दिया ।

अब समय आने लगा ।

पुत्री के विवाह के सिर्फ 2 दिन बचे थे ।

उमा ने कहा --- भगत जी सिर्फ 2 दिन बाद आपकी पुत्री का विवाह है और अभी तक कुछ भी तैयारी नहीं हुई ।

मैं आपको इतने दिनों से सचेत करती आ रही हूं की पुत्री का विवाह तय हो चुका है । कुछ तो सामान इकट्ठा कर लो।

कुछ थोड़ा बहुत पैसा तो कर्जे में ले लो, आपको लोग दे ही देंगे पर आप तो माँगते ही नहीं ।

तब दीनानाथ जी ने थोड़ा रुष्ठ होकर कहा -- मैंने तुम्हें कहा था ना कि मुझे किसी से पैसे मांगना पसंद नहीं है ।

मैं परमात्मा के आश्रित हूँ।

अपने भगवान से जिद करके सब कुछ मांग सकता हूं ।

संपूर्ण जीवन में तुमने देखा है ना, जो कुछ तुमने कागज पर लिख कर दिया है वह मैंने भगवान के श्री चरणों में वह निवेदित किया है और भगवान शंकर ने हमारी सारी मनोकामनाँए पूर्ण की है ।

तो आप -- आखिर क्यों चिंता करती हो ।

अभी भी तुम्हें जिस चीज की आवश्यकता है, उसे लिख कर दो ।

भगवान शंकर जी स्वयं पूर्ण करेंगे ।

उमा रोते हुए कहने लगी-- अरे ! खाने-पीने की चीजों की बात अलग है, वह तो कोई भी दे जाता है ।

पर इस समय कन्या के विवाह के लिए दहेज की आवश्यकता है ।

सोना लगेगा, बर्तन भी लगेंगे अन्य प्रकार के चीजों की आवश्यकता पड़ेगी, कौन देकर जाएगा ।

भगत जी कहने लगे -- तुम फिर चिंता कर रही हो ।

जब मैंने तुम्हें कहा है ना भगवान शंकर जी सदा मेरे साथ है फिर क्यों चिंता करती हो ।

तुम मुझे कागज पर लिख कर दे दो ।

और उमा ने रुष्ट होकर कागज पर दहेज का सारा सामान लिखकर दे दिया ।

वैसे तो पहले एक कागज ही बनता था, पर आज सामान के आठ कागज बन कर तैयार हो गए ।

उसने कागज की लिस्ट बनाकर दीनानाथ जी को देते हुए कहा ---- जाओ ! भगवान शंकर अगर सच्चे हैं, तो देखती हूं, तुम्हारी इच्छा कैसे पूरी करती हैं ???

भगतजी तो मस्त भाव से भगवान के भजन गाते हुए शंकर भगवान जी के मंदिर में पहुंचे ।

वह कागज की लिस्ट भगवान शंकर जी के नजदीक रख दी और प्रार्थना करते हुए कहने लगे -- भगवान !! मैंने तो आपके ऊपर सदैव सच्चे मन से यकीन किया है और आप के प्रति मेरी निष्ठा भी सच्ची है, मेरा विश्वास भी सच्चा है ।

2 दिन बाद मेरी कन्या का विवाह है और कन्या का विवाह तभी संपन्न हो पाएगा जब आप मेरे साथ चलेंगे ।

एवं मेरी स्त्री को तो वैसे तो बहुत यकीन है आपके ऊपर, पर आज उन्है आवश्यकता है कन्या के विवाह के लिए कुछ दहेज की ।

अब आप ही इसे पूर्ण कीजिए ।

इस प्रकार आंखों में आंसू भर कर वह कागज भगवान शंकर के नजदीक रख दिया और उनकी सेवा में व्यस्त हो गए ।

दीनानाथ जी तो यहां पर भगवान की सेवा में व्यस्त हो गए ।

उधर एक संपन्न ' सेठ ' दीनानाथ के घर पहुंचे और आवाज लगा कर कहने लगे -- अरे ! दीनानाथ जी का घर यहीं है ।

भगत जी की धर्मपत्नी उमा ; बाहर आकर कहने लगी--- हां यही है दीनानाथ जी का घर ।

आप कहिए ---किनसे मिलना है ?

तब वह सेठ कहने लगे --- कि आज प्रातः काल दीनानाथ जी मेरे घर आए और उन्होंने कहा उनकी कन्या का विवाह है, उन्हें पैसों की आवश्यकता है ।

अब मैं तो भगत जी को बचपन से जानता हूं ।

भगत जी की जो कन्या है वह मेरी कन्या है ।

उनका सारा समय तो भगवान शंकर जी की सेवा में जाता है ।

तो मेरे मन की इच्छा भी थी कि मेरी तो कोई कन्या है ही नहीं, क्यों ना मैं इस कन्या का विवाह करा दूँ ।

इसलिए आपने अपने सामान की लिस्ट जो उनको बनाकर दी थी, वह सारा सामान में लेकर आया हूं ।

सेठ की बात सुनकर उमा हैरान हो गई ।

और सोचने लगी सेठ जी इतना सारा सामान देकर जा रहे हैं और किस प्रकार कोई किसकी मदद कर सकता है ?

अब उमा ने सोचा ।

हो सकता है- यह सेठ जी मेरे पतिदेव के मित्र हों ।

इसलिए सहायता करने आए हैं ।

ऐसा सोचकर जितना सामान उन्होंने लिखकर दिया था उससे दुगना सामान वह सेठजी दीनानाथ जी के घर पर छोड़ कर गए ।

अब वह कहने लगी --- मैंने तो इस गांव में आपको पहली बार देखा है ।

आप कहां रहते हो ??

सेठ जी कहने लगे -- मैं तो दीनानाथ जी को बचपन से मिलता रहता हूं और आप चिंता ना करें, आप तो अपनी पुत्री का विवाह बड़े अच्छे तरीके से कराइयेगा ।

और दीनानाथ जी की पुत्री के विवाह में कोई कमी नहीं आएगी।

परमात्मा भला करेगा ।

और एसा कहकर , वह सेठ जी तो चले गए ।

शाम के समय दीनानाथ जी घर आए ।

सारा घर सामान से भरा पड़ा था ।

अपनी धर्मपत्नी को बुलाकर कहा -- यह सामान कहां से आया ?

किसी से कर्जा लिया है ???

तुम्हें भगवान के ऊपर यकीन नहीं है ?

मैंने तुम्हें कहा था कि भगवान शंकर जी से प्रार्थना करेंगे ।

उसके पश्चात भी तुमने लोगों से सामान मांगा है ।

भगत जी की बातें सुनकर, उमा कहने लगी --- मैंने किसी से सामान नहीं मांगा है ।

यह तो आज सुबह एक सेठ जी आए थे । वह कह कर गये -- कि आप उनसे मिलने गए थे । अपने सारे कागज उनको दिखा कर कहा इतने सामान की आवश्यकता है ।

पर वह सेठ जी बड़े दयालु हैं , जितना आपने सामान लिख कर दिया है ना उससे दुगना सामान देकर गए हैं ।

जब उमा की यह बात, दिनानाथ जी ने सुनी।

वह समझ गए ।

वह मित्र और कोई नहीं, भगवान स्वयं आकर मेरी पुत्री के विवाह के लिए यह कन्यादान का सामान देकर गए हैं ।

अपनी पत्नी की बातें सुनकर उनके आंखों में आंसू आ गए और रोते हुए कहने लगे ---- मैंने तुम्हें कहा था ना परमात्मा हमारे साथ हैं ।

वह कभी हमारे साथ जीवन में कोई कमी नहीं रखते हैं, उसके उपरांत भी तुम आज सुबह नाराज होने लगीं मेरे भगवान शिव पर ।

देखा -- आज वह कितना सामान देकर गए हैं ।

अब एक बात सुन लो उमा --- जब तक भगवान शंकर मेरी पुत्री के विवाह में मेरे साथ नहीं चलेंगे, मैं तुम्हारे साथ शादी में नहीं चलूंगा । 

भगत जी की यह बातें सुनकर उमा का दिल बैठ गया ।

वह कहने लगी --- भगवान शंकर कैसे चल सकते हैं ।

वह तो कृपा करके चले गए हैं ना ।

अब तुम जिद छोड़ो ।

2 दिन बाद हमारी पुत्री का विवाह है, कृपया तुम यह बखेड़ा खड़ा ना करो ।

अब भगत जी तो अपनी बात पर अटल हो गए ।

वह कहने लगे- जब तक भगवान शंकर जी स्वयं ना चलें, तब तक मैं बिल्कुल नहीं चलूंगा ।

और कहने लगे।

तुमने सारे शहर को न्योता दे दिया है, तुम मंदिर में गई हो - -भगवान शंकर जी को निमंत्रण देने ???

वहां भी तो जाना चाहिये था।

उमा भी प्रेम से डांटते हुए कहने लगी -- सारा दिन तो तुम वहीं बैठे रहते हो । 

क्या तुम्हारा काम नहीं है ??

भगवान शंकर को कहना । 

अब वह सीधे साधे भक्त थे ।

कहने लगे --- भगवान शंकर जी को तो मैंने कह दिया है,

पर जो उनकी और मंडली है ना उनसे बिल्कुल नहीं कहा है।

और खासकर भगवान गणेश जी को तो बिल्कुल नहीं कहना है क्योंकि वह इस प्रकार खाते हैं कि अपना प्रसाद ही गायब कर देते हैं ।

मेरे लिए मंदिर में कुछ खाने के लिए बचता ही नहीं है ।

बताओ ?

अपने पति देव की बातें सुन, उमा मुस्कुराकर कहने लगी --- आप चिंता ना करें ।

रात्रि विश्राम करें ।

अब दो दिन बाद पुत्री का विवाह है ।

अब आप तैयारी कीजिए ।

आपको विवाह में चलना है ।

और इस प्रकार बातें करते-करते दोनों सो गए ।

दूसरे दिन प्रातःकाल, दीनानाथ जी भगवान शंकर के मंदिर में चले गए ।

जिस प्रकार रोज जाते थे और सेवा करके आ गए ।

तीसरा दिन आया ।

पुत्री के विवाह का कार्य था ।

भगतजी तैयार होकर, पुनः मंदिर की ओर जाने लगे ।

धर्म पत्नी ने कहा -- कहां जा रहे हो ??

दीनानाथ जी ने कहा --- मैं अपना नियम नहीं तोड़ सकता हूं ।

दर्शन करने जा रहा हूं ।

धर्मपत्नी ने कहा - जल्दी आइयेगा ।

हमें अपनी पुत्री को लेकर दूसरे गांव चलना है, कहीं देर ना हो जाये ।

दिनानाथ जी कहने लगे --- मैंने तुमसे कहा था ना, जब तक भगवान शंकर विवाह में नहीं चलेंगे, मैं तुम्हारे साथ नहीं चलूँगा ।

धर्मपत्नी कहने लगी -- अरे! यह जिद्दछोड़ो ।

पुत्री का विवाह है , भगवान शंकर और कृपा क्या करेंगे ?

आपको दहेज का धन देकर गए ना ।

उसके पश्चात भी और किस चीज की आवश्यकता है ?

पर भगत जी मानने को तैयार नहीं ।

वह कहने लगे -- वह कन्या भगवान शिव की है, जब तक वह नहीं चलेंगे, मैं नहीं चलूंगा ।

इस प्रकार की जिद करके, दीनानाथ जी -- भगवान शंकर के मंदिर में आ गए और बैठ गए ।

अपना ध्यान करने लगे ।

समय बीतने लगा  वहां पर घर वाले इंतजार कर रहे हैं, जल्दी से वापस आए।

और इधर भगत जी जाने को तैयार ही नहीं ।

अब कहते हैं ना । जब भगत इतना सरल हो और उसका प्रेम इतना निष्ठावान हो तो भगवान को चिंता हो जाती है और भगत अगर दीनानाथ जी की तरह बड़ा सरल, धर्मनिष्ठ हो तो उसकी चिंता अधिक हो जाती है ।

यहां से कथा एक नया मोड़ लेती है ।

दीनानाथ जी तो बैठकर भगवान शंकर जी की पूजा करने लगे । भगवान शंकर जी मन में विचार करने लगे, 

यह तो बड़ा अजीब भक्त है ।

भक्त जी ने जो जो मुझे देने के लिए कहा था वह तो मैं घर पहुंचा कर आया हूं ।

अब इसे किस चीज की आवश्यकता है ।

तभी उस मंदिर में एक आवाज आई ।

भगवान शंकर जी की मूर्ति में से वह कहने लगे -- अरे भगत जी !! जाओ अपनी कन्या का विवाह कराओ ।

दीनानाथ जी ने इधर-उधर देखा , उनको कुछ समझ में ही नहीं आया ।

पूछने लगे -- कहां से आवाज आ रही है ?

भगवान शंकरजी ने कहा --- हम बात कर रहे हैं, तुम जाओ 'भगतजी' अपनी कन्या का विवाह करा कर आओ ।

दीनानाथ जी कहने लगे --- अरे भगवन ! मैंने तो सारी उमर आपकी सेवा की है ।

आपको तो पता है ना --आप मेरे पिता तुल्य हैं ।

और मैं आपसे हर बात पर जिद करता हूँ और आप मेरी हर जिद पूर्ण करते हो 

आप को जब पता है कि मैं आपके बिना नहीं जा सकता हूँ ।

तो मैं विवाह में कैसे जाऊंगा ।

आप चलोगे तो मैं आपके साथ चलने को तैयार हूं ।

भगवान शंकरजी ने कहा -- जितना हमें करना था, हम कर चुके ।

अब दीनानाथ जी कहने लगे --- इसका मतलब, आपने पैसा दे दिया और काम हो गया ।

अब अगर मैं भी आपके पास आऊं और जल चढ़ा कर चला जाऊं क्या इतना ही काफी है ?

बैठने की आवश्यकता नहीं हैं ?

आप से प्रेम करने की आवश्यकता नहीं है ?

भगवान शंकर कहने लगे -- ऐसी बात नहीं है, तुम जाओ अपनी कन्या का विवाह करा कर आओ ।

भगत जी कहने लगे -- आपको चलना ही पड़ेगा मेरे साथ ।

मैं नहीं जाऊंगा आपके बिना ।

भगवान शंकर जी विचार करने लगे -- शादी मैं कैसे चला जा सकता है ? 

भगवान शंकर जी को विचार करते देख माता पार्वती ने पूछ लिया -- भगवन क्या चिंतन चल रहा है ?

भगवान ने कहा -- मेरा भक्त मुझसे जिद कर रहा है कि आपको कन्या के विवाह में चलना ही पड़ेगा ।

तो मैं सोच रहा हूं -- कैसे जाऊं ?

इसी बीच भगत जी बोल पड़े - सोचना क्या है ?

कल "सेठजी" बनकर धन देकर गए थे ना घर पर ।

वही सेठ बन जाओ , मैं अपनी धर्मपत्नी को कह दूंगा कि सेठ जी को शादी मैं ले कर आया हूं ।

भगवान शिवजी को भक्त का सुझाव पसंद आ गया। 

और अब भगवान शंकरजी तो सेठ जी बन गये।

अब माता पार्वती जी कहने लगी -- आप अकेले कैसे जाएंगे, मैं भी आपके साथ चलूंगी । 

अब माता पार्वती जी भी उनके साथ चलने के लिए तैयार होने लगी, 

जैसे ही भगवान शंकरजी और माता पार्वतीजी तैयार हुई ।

भक्त जी फिर कहने लगे-- मैने आपको पहले ही कहा था गणेश जी को लेकर नहीं चलना है । तो गणेश जी तो नहीं चलेंगे ।

अब गणेश जी ने आवाज सुन ली - - भक्त जी की ।

गणेशजी कहने लगे - मैं तो अवश्य चलूंगा ।

मेरे बिना तो शादी होती ही नहीं है ।

सबसे पहले मुझे ही बुलाया जाता है ।

माता पिता शादी में सम्मिलित हों और मैं ना चलूँ, ऐसा हो ही नहीं सकता है ।

भगतजी जिद करके बैठ गए।

अगर गणेश जी चलेंगे तो मैं नहीं चलूंगा ।

भगवान शंकरजी विचार करने लगे , 

एक तरफ भगत और एक तरफ पुत्र । क्या किया जाए ?

तब भगवान शंकर जी ने युक्ति निकाली ।

भक्त को समझाने हए कहने लगे -अरे भगतजी तुम तो ब्राह्मण परिवार के हो । तुम्हें तो विधि विधान का तो पता है।

तुम्हें तो जानकारी होती है ना ।

जब कोई विवाह होता है, सबसे पहले गणेश जी को बुलाया जाता है ।

यह तो तुम्हारा सौभाग्य है, भगवान गणेश स्वयं हमारे साथ चल रहे हैं ।

पहले तो मानने को तैयार नहीं हुए ।

पर भक्त जी ने एक शर्त रखी !!!

कहा -- गणेश जी चलेंगे तो एक शर्त है ।

यह बिना पूछे कुछ भी नहीं खाएंगे ।

यहां पर शादी में सामान कम होगा तो दिक्कत हो सकती है ।

मैं जितना इन्हें खाने के लिए दूंगा यह उतना ही खाएंगे ।

अब गणेशजी ने मुस्कुराते हुए भक्तजी की शर्त स्वीकार कर ली ।

क्योंकि मन बड़ा सच्चा था ।

जिसका मन सच्चा होता है ना, परमात्मा उसके साथ होता है ।

अब भक्त जी तैयार हो गये ।

भगवान गणेश जी भी तैयार हो गए ।

भगवान शंकर जी तैयार थे माता पार्वती के साथ निकलने वाले ही थे ।

नंदीजी उठकर खड़े हो गए ।

भगवान मेरे बिना कैसे जाओगे ?

अब नंदी जी की आवाज सुनकर और जितने गण थे वे भी तैयार हो गये ।

भगवान शंकर जी कहने लगे-- भगत जी मंडली तो बहुत बड़ी हो गई है ।

भक्त जी कहने लगे -- आपकी मंडली को देखा है !! 

कैसे बिना कपड़ों के रहते हैं, उनको तो तरीका भी नहीं है ।

आज आप कितने सुंदर लग रहे हैं ।

कितना सुंदर वेश बनाया है ।

अब इस प्रकार बात चल ही रही थी, तब नंदी और अन्य गण कहने लगे -- हम भी चलेंगे ।

तब भगवान शंकर ने अपने गणों से कहा --- आप सब ने तो मेरी शादी में सम्मिलित होकर आनंद लिया था ना ।

यह भक्त की बेटी की शादी है ।

वहां पर इतनी भीड कैसे चल पाएगी ??

तब नंदी और अन्य गणों ने कहा -- हम अदृश्य रूप में चलेंगे ।

किसी को खबर नहीं लगेगी ।

अब सबकी बात मानकर भगवान शंकर भक्त के साथ चलने को तैयार हो गए ।

अभी मंदिर की एक सीढी उतरे ही रहे थे कि भक्त ने रोककर कहा -- अरे भगवान ऐसे कैसे चलोगे ।

भगवान शंकर ने कहा-- अब क्या हुआ ???

कहा --- गले में यह साँप, लोग कहेंगे सेठ बन कर आए हैं और गले में सांप ।

आपने मुझे पहले ही शर्त दी है, कि मुझे किसी को बताना नहीं है कि आप भगवान शंकरजी हैं ।

अगर आपके गले में यह सांप रहेगा तो लोग पहचान जाएंगे ।

और सांप के बाद जब उनका ध्यान गंगाजी की और गया तो मस्तक से तो गंगा जी का जल बह रहा था ।

भक्तजी ने कहा -- या तो इन्हें छिपाइये, या तो इन्हैं यहाँ छोड़ कर चलिए ।

तब शेषनागजी, जो भगवान शंकर जी के गले में थे ।

तब भक्तजी की बात सुनकर उनसे रुष्ट होकर कहने लगे --- मुझे क्यों छोड़ कर चलेंगे ?? 

मैं तो चलूंगा ।

भक्तजी की ने कहा -- ऐसे कैसे चलोगे ?? देखा है अपना वेश । लोग डर जाएंगे, शादी में आपको देखकर ।

तब शेषनाग जी ने कहा --- अभी तो तुम्हारी बहुत चल रही है, बाद में जब मंदिर में आओगे तब तुम्हारी खबर ली जाएगी ।

भगवान शंकर जी से जिद कर कहने लगे --- भगवान इसे उतार दो अपने गले से ।

भगवान शंकर ने जैसे ही शेषनाग को हटाने के लिए हाथ आगे बढ़ाया वैसे ही शेषनाग भगवान से कहने लगे --- भगवान में इस वेश में नहीं चलूंगा ।

मैं आपका सोने का हार बन जाऊंगा ।

और ऐसा कहकर शेषपाग सोने का हार बनकर भगवान शंकर के गले में स्थापित हो गए और बाकी सब छोटे छोटे सांप थे वह भी भगवान शंकरजी के आभूषण बन गये ।

भगवान शंकर जी चलने लगे तो गंगा जी बह रही हैं ।

लोग कहेंगे यह मस्तक से पानी कहां से निकल रहा है, यह भी चिंता का विषय है ।

गंगा जी के मन में विचार हुआ, भक्त जी मुझे लेकर नहीं चलेंगे ?

तब गंगा जी स्वयं प्रकट होकर कहने लगीं -- मैं भगवान शंकरजी के आगे आगे चलूंगी जिससे किसी को आभास ही नहीं होगा कि मस्तक से पानी बह रहा है ।

अब सारी तैयारी हुई 

अब भगवान शंकर जी ' सेठ ' के रूप में माता पार्वतीजी 'सेठानी' के वेश में और गणेश भगवान जी तो छोटे 5 वर्ष के बालक के रूप में चल दिए ।

अब गणेशजी का हाथ भगतजी ने अपने हाथ में पकड़ लिया, और थोड़ा प्रेम से कहने लगे -- तुम्हें बिना पूछे कुछ नहीं खाना है ।

भगवान शंकरजी ने यह बात मान ली थी ।

इसलिए तुम्हें वहां पर मेरे से बिना पूछे कुछ लेना नहीं है ।

गणेश जी मुस्कुरा कर कहने लगे, जैसा आप कहेंगे वैसा ही किया जाएगा ।

अब सब मिलकर भगत जी के घर पहुंचे ।

वहां पर कन्या की शादी की तैयारी चल रही थी ।

भगतजी को देखकर उनकी धर्मपत्नी उमा पूछने लगी -- हो कर आए मंदिर से ?

भगवान शंकर जी आ गए ?

अभी भगतजी कुछ जवाब देने ही वाले थे कि भगवान शंकर ने इशारा कर दिया --- मैंने तुम्हें पहले ही कहा था, अगर किसी को कुछ बताओगे मेरे बारे में तो मैं अदृश्य हो जाऊंगा ।

भगवान शंकर का इशारा समझ कर भक्त जी चुप हो गए और कहने लगे --- भगवान शंकरजी तो नहीं आये , पर उस मंदिर के मालिक सेठ जी यह हमारे साथ आये हैं ।

उन सेठजी को देखकर उमा उनको पहचान गई ।

कहा -- यही तो सेठ जी थे जो कल धन देकर गए थे ।

यह हमारे साथ शादी में चल रहे हैं ।

भक्तजी ने कहा -- हाँ यह भी चल रहे हैं और यह उनकी धर्मपत्नी है ।

यह भी हमारे साथ चल रहे हैं ।

पर छोटे बालक की ओर इशारा करके कहा -- यह भी हमारे साथ चल रहे हैं, पर उनका ध्यान रखना पड़ेगा ।

यह बिना पूछे ही बहुत कुछ खा लेते हैं ।

उमा ने कहा -- शादी का माहौल है , छोटा बच्चा है, वह तो अवश्य खाएगा ।

पर तुमने उसका हाथ क्यों पकड़ रखा है ।

तो भक्त जी ही कहने लगते हैं --- यह बिना पूछे ही यहां वहां चले जाते हैं इसलिए उनका हाथ पकड़ कर रखा है । 

अब इस प्रकार बातें करते ।

अब 

बारात चलने लगी ।

भगवान शंकर जी बारात में शामिल हुए , और बारात का तो कहना ही क्या ।

भगवान शंकर जी के गण , मृदंग बजा रहे थे, ढोलक बजा रहे थे।

बड़ा ही सुंदर दृश्य था ।

अब गाते बजाते सब लोग उस गांव में आ गए जहां पर भक्तजी की कन्या का विवाह था ।

अब कन्या का विवाह प्रारंभ हुआ ।

भगतजी को बुलाया गया ।

भक्तजी आइए और कन्यादान कीजिए ।

जैसे ही कन्यादान की रस्म प्रारंभ हुई, भक्त जी ने भगवान शंकर जी को बुलाया और कहने लगे --- यह पुण्य कार्य आपको ही करना है ।

कितना सुंदर दृश्य रहा होगा ???

बिहार के उस गांव का, जहां पर भगवान शंकर स्वयं सेठजी के रूप में आए और कन्यादान का पुण्यमय कार्य किया ।

भक्तजी भगवान शंकर को लेकर कन्या के नजदीक गए ।

कहते हैं भगवान शंकरजी और माता पार्वतीजी ने अपने हाथों से कन्यादान किया ।

( और जिस स्थान पर कन्यादान किया गया था वह वह स्थान अभी तक बिहार के गांव में स्थित है । वहां पर एक मंदिर बनाया गया है वह मंदिर दान मंदिर के नाम से जाना जाता है । )

कन्या का विवाह अच्छे से सुखपूर्वक संपन्न हुआ । 

अब भगवान जिस विवाह में उपस्थित रहेंगे वहां तो कोई विघ्न आ ही नहीं सकता ।

सब सुख से विवाह संपन्न हुआ ।

सब लोटकर अपने घर आए ।

अब जैसे ही रास्ते में शिव मंदिर पड़ा भक्तजी को देखकर भगवान शंकरजी कहने लगे --- अब हम जा सकते हैं अपने घर में ।

भक्त जी कहने लगे -- भगवान यह सब आपकी ही लीला है, आपने ही यह सारा कार्य पूर्ण किया है ।

और ऐसा कहकर भगतजी भगवान शंकरजी के नजदीक बैठकर रोने लगे ।

भगतजी की धर्मपत्नी पूछने लगी -- क्या हुआ। ?? 

इतना जोर से क्यों रो रहे हो ??

भगतजी कुछ कहने ही वाले थे --- इतने में भगवान शंकरजी ने भगत के मस्तक पर हाथ रख दिया ।

कहा -- शांत हो जाओ ।

भक्त जी समझ गए ।

कुछ बताना नहीं है ।

भगतजी पत्नी को कह कर गए --- सेठ जी को मंदिर की ओर छोड़ कर आता हूं ।

तुम घर चलो ।

ऐसा कहकर अन्य मेहमान तो घर की ओर आ गए ।

और भगवान शंकरजी, गणेशजी माता पार्वतीजी को लेकर व गणों सहित मंदिर में आए ।

मंदिर में आकर सभी अपने- अपने स्वरूप में स्थापित हो गए ।

पर भगत जी का रोते- रोते हुए बुरा हाल हो गया ।

कहने लगे --- प्रभु जो दर्शन आपने दिया था वह मुझे पुनः कब प्राप्त होगा ? वह मुझे पुनः कब प्राप्त होगा ?

भक्तजी की स्थिति नियंत्रण से बाहर हो गई थी ।

वह अपने आप को अपराधी मानकर रोते हुए कहने लगे ।

मैं इतना हठी हूँ , मैं आपसे कितना हठ करता हूं भगवान, पर आप कितने दयालु हैं ।

हर हाल मैं उपस्थित होकर मेरे मन की समस्त कामनाओं को पूर्ण करते हो । 

जब भक्त जी इस प्रकार रोने लगे ।

भगवान शंकर जी पुनः प्रकट हुए और प्रकट होकर भगत के मस्तक पर हाथ रखा ।

जब भगवान शंकर ने भक्त के मस्तक पर हाथ रखा तो भगवान शंकर जी के हाथों से कुछ जल की बूंदें गोरों ।

(वह जल की बूंदें जिस स्थान पर गिरी हैं बिहार में उसका भी मंदिर स्थापित है जिससे शिव नीर मंदिर के नाम से जाना जाता है।

वह इतना पुण्यमय मंदिर है जो भी भक्त वहां पर अपनी प्रार्थनाएं करते हैं और उनकी मन की समस्त मनोकामनाएं पूर्ण हो जाती हैं )

भक्त जी इस प्रकार भगवान जी को छोडकर अपने घर पुनः लोटकर आए ।

उमा ने कहा --- सब कुछ ठीक तो है ?? 

आप का मन बेचैन क्यों है ??

अब तो कन्या का विवाह सुख से हो गया है ।

वह कहने लगे --- तुम्हें पता है वह "सेठजी" कौन थे ?

उमा कहने लगी --- वह तो आपके मित्र थे ना, और उस मंदिर के मालिक ।

दीनानाथजी रोते हुए कहने लगे --- वे ' सेठ जी ' नहीं भगवान शंकरजी थे ।

जिन्होंने अपने हाथों से मेरी कन्या का विवाह किया था ।

तुम पहचान नहीं सकी उनको ।

उमा कहने लगी --- आपने बताया क्यों नहीं ?

बोले -- अगर तुम्हें बता देता तो भगवान शंकरजी अदृश्य हो जाते । फिर मुझे उनका दर्शन ना मिलता ।

उमा जिद करने लगी ।

अब तो मुझे भी उनका दर्शन करना है ।

दूसरे दिन सुबह भगतजी अपनी धर्मपत्नी को लेकर भगवान शंकर जी के मंदिर में आए और प्रार्थना कर कहने लगे -- भगवन !! इसे भी दर्शन दो । इसने संपूर्ण जीवन मुझे सच्चे मन से साथ दिया है ।

इसकी कर्तव्यनिष्ठा से ही मैं आपकी भक्ति कर सका हूं ।

इसे भी अपना दर्शन देकर कृतार्थ करो ।

भगवान शंकरजी ने पुनः प्रार्थना सुन ली ।

प्रकट हुए ।

दोनों पति-पत्नी को दर्शन मिला ।

दर्शन कर वह दोनों भक्त निहाल हो गए।

तो इतना पावन प्रसंग है ना यह कि भक्त जब भगवान को सच्चे मन से पुकारता है तो भगवान स्वयं दौड़े चले आते हैं ।

मन की सारी चिंताएं दूर छोड़ देनी चाहिए, भगवान के हवाले ।

हम कर क्या सकते हैं ?

पर हां अगर सब कुछ छोड़ दिया जाएगा तो जो परमात्मा करते हैं वह दुनिया से अलग हो जाता है ।

देखिए किस प्रकार भगवान शंकर ने स्वयं आकर उस कन्या का कन्यादान किया था ।

जब भगवान शंकरजी ने आशीर्वाद दिया भक्त को , उन भगवान के हाथों से जो जल गिरा, वह स्थान अभी तक बिहार में स्थित है ।

( जिस स्थान पर वह जल गिरा है वहां पर भी मंदिर कायम है ।)

तो भगवान अपने भक्तों की प्रार्थना स्वीकार करते हैं ।

'प्रार्थना' अगर सच्ची हो तो परमात्मा स्वयं चल कर आ जाते हैं।

तो ऐसे भक्त कौशल भगवान जो भक्तों पर तुरंत राजी हो जाते हैं ।

जिन्हें भोलेनाथ कहा जाता है जिन्हें आशुतोष कहा जाता है जिन्हें शंकर कहा जाता है, जिन्हें भगवान शिव कहा जाता है ।

उनके पावन श्री चरणों में हमारा बारंबार प्रणाम है, प्रणाम है , प्रणाम है ।

Conclusion

उम्मीद करता हूँ कि आपको हमारी ये आज की Story पसंद आई होगी। आप इसी  स्टोरी को भी पढ़  जो की हमारे Story Section में  दी गई है। 

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