Mythological Story - जब  गुरुजी ने भक्त की आंखे खोली (Jab Guruji Ne Bhakt ki Ankhe Kholi)


एक बालक था, जो रोज़ एक महात्मा जी के आश्रम में जाया करता था, ।
बड़े प्रेम भाव से सेवा करता, सत्संग सुनता, बड़ा सत्संगी था । सत्संग मे उसे बहुत आनन्द आता था ।
एक बार वह आश्रम मे दो दिन नहीं आया ।

महाराज ने पूछा -- कहां रह गए थे तुम ? 
महाराज मेरी सगाई हो गई ।
महात्मा बोले- बड़ा अच्छा किया ! लेकिन अब तुम हम से गए ।
वह कुछ नहीं बोला ।
2 महीने बाद 5- 6 दिन फिर नहीं आया । 
महात्मा बोले - अब कहां ?
शिष्य बोला --- अब विवाह हो गया । 
कहा --माता-पिता से गए ।
वह फिर चुप रह गया ।
3 साल बाद फिर 4 दिन नहीं आया ।
पूछा -- क्यों नही आये ।
बोला --- आप के सेवक के घर बालक का जन्म हुआ है । 
अछा ! बड़ा अचछा । अब तुम अपने आप से भी गये ।
तो अब वो महात्मा के पीछे पड़ा ,
कि महाराज समझ में नहीं आया, आप नाराज हो ? 
नहीं ; नाराज कायको -- नहीं हैं नाराज ।
बिल्कुल अच्छा है । वह भी एक मार्ग है, प्रिय मार्ग है । 
सही मार्ग हैं; दो ही मार्ग हैं !! अरे ! इसमें कोई गलत और सही की बात नहीं है दोनों ही ठीक हैं ।
अरे भाई बड़े-बड़े शहर में 2 सड़कें होती हैं ।
1 बीच बाजार से जाती है, एक बायपास रोड जाती है।
आगे जाकर तो सड़कें एक ही होती हैं, तो दो ही हैं ।
जो विरक्त हैं उनके लिए मानो संसार के शहर के बायपास रोड से होकर निकल गये ।
जो ग्रहस्थ हैं , वो बीच बाजार में, बेचारे जाम मे फंसते, धक्का- फक्का खाते जैसे बना वैसे किसी तरह अपनी गाड़ी निकाल कर ले गये । पर आगे तो सडक एक ही होनी है। 
लेकिन भाई बड़ी बहादुरी है, गृहस्थों की । 
बाईपास रोड तो वैसे ही खाली पड़ा रहता है चाहे कोई भी निकल जाए ।
वह तो बना ही इसलिए है कि कोई भी झंझट न हो ।
झंझट तो उनका हे जो प्रवृत्ति के बाजार से होकर निकलते हैं ।

तो महात्मा जी ने कहा की बुरी बात नहीं विवाह भी कोई ऐसा थोड़ी ना है।
एक आदमी कह रहा था की - विवाह ! 
देखो विवाह में चरित्र की प्रधानता हो , विवाह में धर्म की प्रधानता हो, विवाह में कर्तव्य की प्रधानता हो, विवाह में प्रेम का आदर्श हो , चरित्र का आदर्श हो, मर्यादा का आदर्श हो, तो विवाह है ।
विवाह माने --- वाह । 
और जहां ना कोई चरित्र और ना कुछ वासना और दुनिया भर की विकृतियों से भरकर संबंध जुड़े तो वो विवाह नहीं होगा ।
वह तो बिआह होता है, वि-आह ! जिसमें -- आह !आह ! बनी रहती है।
तो महात्मा जी ने कहा कि भाई तुमने विवाह किया है तो , वाह है । बोले सो बात नहीं ; महाराज जी । 
आप साफ-साफ कहो ।
आप कह रहे थे कि, हम से गए, माता-पिता से गए, अपने आप से गए ।
महात्मा जी बोले - निंदा थोड़ी ना की थी ।
मैंने तो यह कहा था कि - सगाई हो गई , यानी - अब तुम हमारे रास्ते में नहीं आओगे, तो हमसे गए ।
अब तुम्हारा मार्ग अलग है। 
और विवाह होने पर कहा कि-- माता-पिता से गए । 
बालक ने कहा - कब ?
माता पिता पर जितना ध्यान दे ते थे तो अब कम ही दे पाओगे ।
क्योंकि अब यह भी जिम्मेदारी आ गई, इसलिए ।
और बेटा हुआ तो - अपने आप से गए ।
अब अपनी फिक्र कम करोगे । बेटे के लिए करोगे, बेटे के लिए यह हो जाए, बेटे के लिए वह हो जाए ।
बोला -- महाराज आप तो महात्मा हो, इसलिए कहते हो ।
संसार में कितना लोग किसको चाहते हैं, मुझसे पूछो ।
महात्मा। बोले - तुम संसार में ही रहे ।
बोले -- नहीं-नहीं ।
महात्मा बोले - बता दें। समय आने पर पता लगेगा । 
अच्छा !! ठीक है । 
कई वर्ष बीत गए।
महात्मा बोले -कभी बताएंगे ।
फिर कई वर्ष बीत गए ।
एक दिन पीछे पड़ा बोले- महाराज बताओ ।
महात्मा बोले- तुम इतने दिन हमसे योगाभ्यास सीख रहा है ।
योगाअभ्यास कर रहा है, हां कर रहा हूं । सांस तो रोक लेता हे ना, बोला - हां ! रोक लेता हूं । 
भीतर ही भीतर चलती रहती है, लोग समझते हैं बंद है ।
ऐसा अभ्यास मैंने कर लिया है ।
तो बोले - बस यही प्रयोग करना तुम घर में जाकर कल ।
अगले दिन घर में, वह सांस रोककर पड़ गया ।

क्या हो गया ? क्या हो गया ? अब माता-पिता परिवार वाले सब रोने लगे --- क्या हुआ। ! क्या हुआ ? 
कई उपचार करने वाले आए ।
अंत में-- इनके गुरु जी को बुलाओ । बाबा जी पास जाओ, बबाजी को बुलाओ। 
साधु लोग तो ऐसे मौके पर ही याद आते हैं ।
बुलाये ।
संत जी आए ।
अब वह तो संत जी की ही पूरी योजना थी, बोले - क्या हुआ ?
महाराज , यह तो गया !! बचा लो इसे किसी भी तरीके से। 
संत ने कहा की - भाई मामला तो गंभीर है । लेकिन; 
एक कटोरा दूध मंगाओ । 
एक कटोरा दूध लाए । 
चीनी डालो इसमें, बढ़िया चीनी । महात्मा जी 
अब मोहल्ले के लोग भी तमाशा देखने के लिए आ गये ।
की क्या-क्या हो रहा है ।
अब महात्मा जी ने वह चीनी डला हुआ दूध का कटोरा, ऐसे घुमाया उस पर ऐसे 7 बार । और कुछ ऐसे ; जैसे कुछ मंत्र पढ़ रहे हो ।
फिर बोले - बस एक ही उपाय हैं । 
क्या ?
यह दूध का कटोरा जो पीले, वो मर जाएगा, पर यह बच जाएगा ।बोलो - कौन तैयार हैं ? अब
पिताजी ने रोते हुए कहा हम इसे चाहते तो बहुत हैं पर इतना नहीं चाहते ।
अब उसकी उम्र पूरी हो गई तो गया । अब किसी के प्रारब्ध में क्यों छेड़छाड़ करें ।
मां बोली - मैं तो पी लेती महाराज लेकिन मेरे जाने के बाद मेरे पति की सेवा कौन करेगा । धर्म बिगड़ जाएगा । 
पत्नी से कहा कि बहू । 
पत्नी बोली --भगवान का विधान है ! उसमें कोई क्या कर सकता है ।
मैं अपने माता-पिता के यहां चली जाऊंगी ।
अब मोहल्ले वालों ने सोचा - खिसक लो ! नहीं तो बाबा अपने को दूध दिखाएगा कि - पियो कटोरा । 
मना करते भी अच्छा नहीं लगेगा ।
तो महात्मा जी ने कहा कि, हम पी ले -- अरे महाराज !! संत तो परोपकार के लिए होते हैं।
।। परोपकार वचन मन काया संत स्वभाव 
परहित सरिस धर्म नहीं भाई ।।
आप पी लो , फिर आपके आगे पीछे तो कोई है ही नहीं न रोने वाला । आप तो मर कर भी अमर हो जाओगे ।
आपकी समाधि बनवाएंगे, मेला लगवाएंगे हर साल और अब ।
अब वह तो महात्मा जी सब जानते थे ।
कि कुछ होने वाला तो है नहीं । 
अब वह तो सब सुन ही रहा था पड़ा- पड़ा. ।
। पीकर दूध संत ने, लीन्ही एक डकार ।
यही बोले
।।उठ बेटा चल मेरे संग, अब देख लिया संसार ।।
बेटा ! देख लिया संसार । 
। जिन्हें हम हार समझे थे, गला अपना सजाने को ।
। वहीं अब नाग बन बैठे, हमारे घर खाने को । 
देखो सबसे ज्यादा दुखी आदमी को करती है-- आशा ।
और जब आशा पूरी नहीं होती तो व्यक्ति झटपटाता है, पागल हो जाता है।
और कहता है की - हमें इनसे ऐसी आशा नहीं थी ।
अच्छा सोचता है कि - गलती इनकी । हमे इनसे एसी आशा नही थी ।
गलती -- अपनी । अरे ऐसी आशा ही क्यों थी । वही तो परेशान करती है।

सोचो तनिक कामना अपनी, जीवन में सुख दुख भरती है।
नहीं दूसरा दोषी कोई, आशा ही निराश करती हैं ।। 
नहीं दूसरा दोषी कोई, आशा ही निराश करती है ।
क्षणभंगुर विषयों से सुख का स्थाई आधार ना मांगो ।
प्यार करो, पर प्यार न मांगो ।

प्यार करो पर प्यार न मांगो, 
गैरों से क्या अपनों से भी, सपनो का संसार न मांगो ।

गैरों से क्या अपनों से भी, सपनों का संसार न मांगो ।
तुम्हें दिखाई देती है जो, बसी हुई बस्ती यारों की ।
धोखे में मत आ जाना यह दुनिया है दुकानदरों की ।
बअब व्यवसायी से निश्चल मन का, प्रेम भरा व्यवहार न मांगो 
प्यार करो पर प्यार न मांगो ।
जिसने जगत बनाया जग में, उसकी ही इच्छा चलती। 

जिसने जगत बनाया जग में, उसकी इच्छा चलती है ।
बात कभी कि अलग हमेशा, दिल की दाल नहीं गलती है। 
मुक्ति का उपाय सोचो कुछ, भूक्ति का भंडार न मांगो। 
प्यार करो पर प्यार न मांगो ।

तो करें क्या?

जग को हरी का रूप समझकर, मन में भाव भक्ति का भर लो ।
प्रभु की सत्ता सिंधु सरित सा अपना अहम विसर्जित कर दो।
छूट जाएगा रोना अपने होने का अधिकार न मागों ।
प्यार करो पर प्यार न मांगो ।

देखो फलदायी वृक्षों को, कितने नम्र रहा करते हैं ।
देखो फलदायी वृक्षों को, कितने नम्र रहा करते हैं ।
फल वाले हो कर के पत्थर का कठिन प्रहार सहा करते हैं। 
सीखो यह स्नेह देकर के, बदले में सत्कार ना मांगो ।
प्यार करो पर प्यार न मांगो ।

है अनेक में एक यही तो, मिलता है उपदेश यहां। 
सभी राम का रूप हैं पगले रंक और राजेश कहां ।
इसी दृष्टि से सृष्टि बदल दो रिपु का भी प्रतिकार ना मांगो ।
प्यार करो पर प्यार न मांगो ।

महात्मा जी ने कहा कि बेटा, आशा रखी थी, उसी का यह परिणाम है। इसलिए अपने यहां संसार में रहने के लिये मना नहीं किया । 
आसक्त होने के लिए मना किया है ।
आशा के कारण आसक्त हो जाते हैं । 
यही आशा अटके रहयो कली गुलाब के फूल।
हुए हैं बहुरी बसंत ऋतु इन डारन के फूल !! 
और यही
तो हनुमान जी ने भी विभीषण जी को संसार दिखा दिया ।
जैसे ही महात्मा जी ने उस बालक से कहा कि - उठ ! देख लिया संसार ।
बालक बोला कि -- हां महाराज !! देख लिया ।
हनुमान जी ने भी विभीषण जी को संसार दिखाया ।
विभीषण जी कहते हैं कि रावण है बहुत खराब, लेकिन हमारे लिये ठीक है । 
हनुमान जी ने कहा की - यह भी उसके मोह में अंधे हो गए ।
की वह हमारे लिए ठीक है। 
इनके आंखों से भी पट्टी हटानी चाहिये ।
तो हनुमान जी ने क्या युक्ति सोची ; मालूम ।
संतो के पास तरह-तरह की युक्तियां होती है, जगाने के लिए ।
ऐसी, जैसे युक्ति से इन संत ने उस बालक को जगाया।
इसी तरह हनुमान जी ने यह उक्ति लगाई ।
क्या ???
पूरी लंका जला दी और जानबूझकर विभीषण की कुटिया छोड़ दी।
बस; युक्ति बन गई ।
अब रावण का माथा ठनका। 
लंका के क्या हाल हैं ??
लंका तो पूरी जल गई ।
कुछ बचा ???
बोले --- हां ।
क्या ???
बोले -- विभीषण का मकान बच गया ।
क्या !!!?????
विभीषण का मकान नहीं जला !!!!
विभीषण जी का महल नहीं जला ???
ना !!! नही जला ।
रावण बोला -- अच्छा !! 
बंदर को जब मृत्युदंड दिया जा रहा था तब बचाने कौन आया था ? विभीषण !
जरूर इन दोनों की मिलिजुली भगत है ।
यह हमारा आदमी नहीं है यह उनसे मिला  हुआ है ।
इस तरह से, इस प्रकार से सन्तो की युक्तियां होती हैं।
। सन्त सब जानते हैं।

यहां सन्त ने उस बालक की आंखे खोल दी ।

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