Hindi Story - जब  साँप अहिंसक हुआ, तो उसकी दुर्दशा कैसी (Jab Saamp Ahinsak Hua To Uski Durdasha Kaisi)




                 एक महात्मा कहीं घूमने निकले, दोपहरी का समय था, गांव के किनारे एक वट(बरगद) का वृक्ष था। तो महात्मा ने सोचा उस वृक्ष के नीचे छायां में आराम करें। जब महात्मा वृक्ष के नीचे आराम करने के लिए जाने लगे, तो गांव के एक व्यक्ति ने कहा, अरे बाबा- उस वृक्ष के नीचे नहीं जाना।

महत्मा ने कहा --- क्यों ?

व्यक्ति ने कहा -- वहां बड़ा भयंकर सांप रहता है, बहुतों को काट चुका है और आप भी वहीं जा रहे हैं ।

महात्मा जी भी बड़े अद्भुत होते हैं।

महात्मा बोले -- कोई बात नहीं, उसे भी समझा देंगे, हम तो सब को समझाते घूमते हैं उसको भी समझाएंगे।

        लोगों ने बहुत रोका पर महात्मा नहीं माने, चले गए। और साँप दौड़ा उधर से महात्मा ने देखा, और बोले - रहने दे ! पता नहीं किस कर्म से तू इस योनि में आया है और इस योनि में भी तू ऐसा करेगा। महात्मा ने समझाया और सांप समझ गया। अच्छा देखो ! महात्मा सांप को भी समझा लेते हैं। सांप समझ गया यह और एक आश्चर्य है।

एक आदमी ने कहा-- सांप समझ गया ?

हमने कहा - हां !!

आदमी पूछा - क्यों ?

हमने कहा --- इसलिए क्योंकि वह आदमी नहीं था।
अब आदमी के समझने में कठिनाई - सांप को।

उसने (सांप ने ) कहा कि -- अब मैं किसी को भी नहीं काटूँगा ।

गुरुदेव ने कहा --कि अहिंसा का पालन करना ।

सांप ने कहा -- ठीक है गुरुजी ।
              गुरुजी तो चले गए, जाते जाते गांव वालों से कहा कि --अब सांप भी अहिंसक हो गया है, किसी को नहीं सताएगा, किसी से नहीं बोलेगा। अब वह हमारा चेला हो गया है, महात्मा तो कह कर चले गए। अब गांव के लोग आए देखा, और सांप के पास बैठ गए, सांप कुछ नहीं बोला तो दो चार लोग ओर बैठ गए। एक ने पत्थर मारा, सांप फिर भी नहीं बोला। तो एक गया तो उसने नजदीक से पत्थर मारा, तब भी सांप कुछ नहीं बोला। तो एक ने पूछ पर लात रखी, सांप फिर भी नहीं बोला। तो एक ने पूंछ पकड़ कर साँप को एसे उठाया, और साँप लटक गया, और साँप फिर भी कुछ नहीं बोल रहा था, लड़कों को तो बड़ा मजा आ रहा था।

             अब लोग पूंछ पकड़े, और उस वट वृक्ष की डाली पर एसे डालें जैसे रस्सी डालते हैं, और रस्सी की तरह डालकर झूला झूलैं और झूलते - झूलते थक जाएं तो घर भोजन करने चले जाएं। भोजन करके लौटे तो फिर झूला झूलैं। बेचारे की 5 दिन में ही ऐसी दुर्दशा हो गई कि वह तो मरणासन्न हो गया, हड्डी पसली निकल आई।

             अब गुरुजी लौटे, छठवें दिन, और इधर उधर देखा फिर आवाज लगाई -- चेला ! चेला !  सो, चेला तो दिखाई नहीं पड़े कहीं। एक जगह देखा तो चेला तो बिल्कुल मरणासन्न पड़ा था,

गुरु जी ने देखा, कहा --- अरे !! राम-राम राम-राम राम।

तुम्हारी यह दशा - हे वत्स ! किस कुसंग से हुई है।

सांप बोला -- गुरूजी ! कुसंग से नहीं, सत्संग से हुई है।

गुरुजी बोले --- सत्संग से ???

सांप बोला -- हां ! आपने कहा था कि किसी को मत काटना, किसी को काटना मत, किसी को छेड़ना मत, तो मैं बिल्कुल अहिंसक हो गया। तब से -ये बालक रस्सी बनाकर मुझे -- झूला झूलते हैं, कोई पत्थर मारता है, कोई पांव रखता है। यही अहिंसा के कारण यह दुर्दशा हुई है।

गुरुजी ने कहा ---अरे वत्स !  हमने तुम्हें काटने के लिए मना किया था। फुफकारने के लिए तो मना नहीं किया था।अगर काटोगे तो दूसरे को हानि पहुंचेगी और फुफकारना भी अगर छोड़ दोगे तो अपने को कैसे बचाओगे।

            इसलिए दूसरे को हानि ना पहुंचाओ पर अपने को तो बचाओ। अपने को, अपने धर्म को नहीं बचाओगे तो ये आपको जीने देंगे क्या।

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