Mythological Story - Jab Bhagwan Ji Apne Bhakt Ke Liye Kapde Baichne Gaye.




             राजस्थान के एक छोटे से कस्बे में दो भगवत भक्तों का जन्म हुआ । दोनों ही बड़े कर्तव्यनिष्ठ और श्रद्धावान थे।बचपन से लेकर जवानी तक दोनों ने साथ में अपना जीवन व्यतीत किया और जैसे ही बड़े होते गए घर वालों ने जिम्मेदारी का बोझ डाल दिया। घरवालों ने कहा -- अब बड़े हो गए हो, कुछ कमाया भी करो।

घर वालों की बात मानकर, सेवाराम और मोतीराम ने कपड़े बेचने का काम प्रारंभ किया । कंधे पर कपड़ों के गठान बांधकर वह गली-गली, गांव-गांव कपडे  बेचने जाते थे। गर्मी के मौसम में सूती कपड़े और ठंड के मौसम में ऊनी कपड़े बेचते थे।


                एक बार दोनों दोस्त किसी गांव में सर्दी के मौसम में कपड़े बेचने जा रहे थे। तभी सेवाराम की नजर एक वृद्ध महिला पर गई । वह वृद्ध महिला बड़ी तीखी ठंड में काँप रही थी। सेवाराम को दया आ गई और उसने अपने कपड़े की  गठान से एक कंबल निकालकर उस वृद्ध माता को दे दिया। वृद्ध माता को जब वह कंबल प्राप्त हुआ तो वह बड़ी प्रसन्न हुई और दिल से आशीर्वाद दिया --- तुम दोनों दोस्त बड़े प्रसन्न रहोगे, भगवान का आशीर्वाद सदा तुम पर बना रहेगा और मन से ऐसा आशीर्वाद निकल ही रहा था तभी वह बुजुर्ग कहने लगी --- तुम थोड़ी देर मेरे घर के बाहर रुको मैं घर में अंदर से कुछ लेकर आती हूं। उसे अपने साथ रखना और वह ऐसा कहकर घर के अंदर चली गई और घर में स्थापित एक छोटी सी शंकर भगवान की मूर्ति लेकर बाहर आई और सेवाराम को हाथ में देते हुए कहने लगी-- यह मेरे भोलेनाथ हैं । तुम इनकी सेवा करना । उनकी कृपा से तुम्हारे पास बहुत सी दुकानें हो जाएंगी और फिर तुम सेठजी बनकर कमाते रहना । फिर तुम्हें भटकना नहीं पड़ेगा ।  उस वृद्धा की बात सुनकर मोतीराम खीझ सा गया और माता से कहा -- - माता ! हमें आशीर्वाद भले दो पर हमारे साथ ऐसा मजाक ना करो । हम गली-गली घूमकर कपड़े बेचते हैं ।  हमारे पास इतना पैसा भी नहीं बचता कि आगे चलकर कोई दुकान खोल सकें।

वृद्ध माता ने कहा--- चिंता मत करो ।  भगवान भोलेनाथ सब भला करेंगे । और ऐसा कहकर उस वृद्ध माताजी ने वह मूर्ति सेवाराम के हाथों में सौंप दी।

                सेवाराम बड़ा श्रद्धालु किस्म का इंसान था ।वह बहुत प्रसन्न हो गया और उस मूर्ति को अपने साथअपने घर लेकर आया। दूसरे दिन दोनों व्यापार करने निकले और आज उनको व्यापार में बहुत अधिक धन मिला। धीरे-धीरे  व्यापार धंधा बढ़ता गया। दोनों ने मिलकर एक साइकिल ले ली।अब वह साइकिल पर सामान बेचने जांए और साइकिल के अगले हिस्से पर भगवान शंकर जी की मूर्ति को रखते थे। लोगों का विश्वास इनके प्रति बढ़ता गया। उन्होंने अपना व्यापार और बढ़ाया और एक दुकान खोल ली।अब दुकान के उद्घाटन पर उन्हौने भगवान शंकर जी की वही मूर्ति स्थापित की।लोग आयें और इनसे सामान लेकर जाएं, इनकी महिमा गाए और भगवान शंकर की मूर्ति को प्रणाम करें।


                अब पहले  एक दुकान थी, धीरे-धीरे व्यापार बढ़ने लगा। एक दुकान हुई, दूसरी दुकान हुई, तीसरी दुकान हुई।और आज उस वृध्द माता की भविष्यवाणी सच होने लगी, जो कहती थी -- मेरे भोले बाबा की कृपा से तुम्हारा व्यापार बढ़ते ही जाएगा।

                दोनों दोस्त वृद्ध होने लगे, अब कभी-कभी सेवाराम दुकान पर आता था और कभी-कभी घर ही बैठ जाता था। एक दिन जैसे ही सेवाराम दुकान पर आया। मोतीराम ने कहा -- मेरे दोस्त तुम अब घर मत बैठा करो। मैं तुम्हारे बिना नहीं रह पाता हूं। सारी उमर हमने साथ जीवन जिया है और इस वृद्धावस्था में तुम कभी-कभी घर बैठ जाते हो तो मेरा मन भी दुकान पर नहीं लगता है।
 
मैं तुमसे प्रार्थना करता हूं -- तुम रोज आया करो। जिससे कि हम दोनों का मन बहलता रहेगा।

सेवाराम हंसते हुए कहने लगा -- अरे मित्र ! आजकल मेरा मन घर के नजदीक बने एक शिवालय में अटक गया है। मैं रोज वहां जाता हूं और भगवान शंकरजी की सेवा करता हूं और सेवा करते- करते कैसे समय व्यतीत हो जाता है, मुझे इस चीज का भान ही नहीं रहता पर अगर तुम कह रहे हो तो मैं प्रयास करूंगा रोज आ सकूं।पर एक बात कहूं, मोतीराम -- तुम चिंता मत किया करो, हमारा व्यापार शुरू से परमात्मा संभालते आए हैं और वह भोलेनाथ आगे भी हमारा व्यापार स्वयं संभालेंगे। अगर हम नहीं भी रहे तो वह आकर हमारा काम स्वयं देख कर जाएंगे। ऐसा कहकर, सेवाराम अपने घर आ गया।

               दूसरा दिन हुआ, सेवाराम पुनः दुकान पर पहुंचा पर आज दोपहर के 12:00 बज चुके थे। मोतीराम ने कहा -- मित्र !! तुम आज  फिर देर से आए, क्या बात हुई ? 
सेवाराम ने कहा --- आज मंदिर में थोड़ा पूजा-पाठ था, मन वहीं लग गया इसलिए आ ना सका।

समय व्यतीत होता गया। तीन चार महीने निकल गये। एक दिन सेवाराम और थोड़ी देर से आया।
मोतीराम ने कहा --- आज फिर देर से आए, क्या बात थी ? मंदिर में कोई कार्यक्रम था ? 

सेवाराम हंसते हुए कहने लगा --- आज भोले बाबा ने मुझे अपने पास ही बिठा लिया और जानें ही नहीं दिया, इसलिए मुझे आने में देर हो गई।

अभी बात चल रही थी कि सेवाराम कहने लगा --- मोतीराम तुमसे एक बात कहूं ?

मोतीराम ने कहा -- हां हां कहो, क्या बात है ?

सेवाराम कहने लगा --- मोतीराम आज से तुम मुझे शिवाराम कह के पुकारा करो । मुझे शिवाराम बड़ा अच्छा नाम लगता है।
मोतीराम हंसते हुए कहने लगा --- इतनी सी बात है !! मैं आज से तुम्हें शिवाराम कह कर ही पुकारूंगा और ऐसे बात करते-करते शिवाराम अपने घर चला गया।

समय अपनी गति से चलता रहा। शिवाराम अपना कार्य पूर्ण कर के दुकान से 5:00 बजे अपने घर की ओर चला जाता था। एक दिन शिवाराम जैसे ही घर की ओर जाने लगा।

तभी मोतीराम ने कहा --- अरे शिवाराम !! कल तुम दुकान पर मत आना। मैं कल सुबह तुम्हारे घर पर अपनी पुत्री की शादी का कार्ड देने आऊंगा । तो मैं तुमसे घर पर ही मिलूंगा। तुम कल घर पर ही रहना। कल कहीं जाना नहीं।

शिवाराम ने कहा -- ठीक है। मैं कल तुम्हारा अपने स्थान पर इंतजार करूंगा और ऐसा कहकर शिवाराम चला गया।

             मोतीराम सुबह उठा और आज अपने दोस्त के घर जाना था तो बड़े ढ़ंग से तैयारी करने लगा। सामान लिया। अपने दोस्त के लिए मिठाई ली और अपने दोस्त को जो सामान खाने में पसंद था, वह सारा सामान बाजार से लेकर दोस्त के घर की ओर चल पड़ा। मन में खुशी इतनी थी कि मैं अपने सच्चे दोस्त को अपनी कन्या की शादी का निमंत्रण देने जा रहा हूं।


               और मार्ग में जो मिलता उसे कहता -- आज मैं अपने दोस्त के घर जा रहा हूं। आज मैं अपने सखा के घर जा रहा हूं। और ऐसी खुशी में फूलता हुआ, वह सेवाराम के घर आकर पहुँचा और जैसे ही घर के अंदर गया।उसने सबसे पहले सेवाराम के पोते को अपनी गोदी में उठा लिया।

और उसे प्यार से सहलाते हुए पूछने लगा --- बेटा दादा को बताना मत कि मैं आ गया हूं। हम दोनों मिलकर उसे अचंभित कर देंगे।

               तभी वह दोनों थोड़े और अंदर गए और जैसे ही अंदर गया, उसने सेवाराम की धर्मपत्नी को चक्की चलाते हुए देखा और प्रणाम करके पूछा -- भाभी जी कैसी हो और भैया कैसे हैं ?
जब मोतीराम ने भाभी जी से यह सवाल किया तो सेवा राम की पत्नी की आंखों से आंसू आने लगे।
मोतीराम कहने लगा --- मैंने कुछ गलत पूछा है ?
तब वह पतिव्रता नारी कहने लगी -- आप क्या पूछते हो ? आपसे कौन सी बात छुपी हुई है। आप तो सब कुछ जानते हो।आपको पता है, 6 महीने पहले ही सेवारामजी का स्वर्गवास हो गया है। उसके बाद भी आप मुझसे ऐसा दुख देने वाला सवाल पूछते हो की सेवाराम कैसे हैं।तो बताओ -- मैं तुम्हें इसका क्या जवाब दूं ?

मोतीराम ने जब सेवाराम के स्वर्गवास का सारा हाल जाना तो उसके मन को बड़ा धक्का लगा। वह अपने आप को संभालते हुए कहने लगा -- भाभी जी आप ऐसा क्यों कहते हो। सेवाराम जी तो रोज मेरी दुकान पर 12 बजे आता है और 5:00 बजे चला जाता है।

भाभीजी ने कहा -- भाई जी !! आप कैसी मजाक करते हो ? 6 महीने पूर्व जब मेरे पति का स्वर्गवास हुआ था, तब आप ही तो उनके क्रियाकर्म की सारी विधि करने आए थे। और आप ही तो हर महीने आकर हमारे घर का खर्च देकर जाते हैं। उसके बाद भी, आप ऐसे सवाल कर रहे हैं ?


           जब मोतीराम ने भाभी के मुंह से ऐसे शब्द सुने। तो उसका मन बैठ सा गया। कहा --- मैं तो छह महीने से कभी यहां आया ही नहीं, और सेवाराम तो रोज मेरी दुकान पर आता है। तो यह  कैसा आश्चर्य है ?? ऐसा सोच ही रहा था तो उसे वह सेवाराम की बात याद आ गई। कि सेवाराम ने कहा था -- अरे मोतीराम !! मैं व्यापार के लिए दुकान पर आऊँ या ना आऊँ  पर मेरे भोले बाबा जरूर आकर मेरी दुकान की संभाल करेंगे और इस बात को सोचकर, मोतीराम जल्दी से सेवाराम के घर से उठा और भागते हुए अपनी दुकान की और आया और जैसे ही दुकान की और आया तो देखता है कि आज दुकान पर सेवाराम है ही नहीं। तो उसके सामने वह सारा चित्र चलने लगा कि सेवाराम मेरी दुकान पर आया और 6 महीने पहले कहने लगा-- - अब से मेरा नाम सेवाराम नहीं है मैं शिवाराम हूँ। मोतीराम समझ गया कि वह और कोई नहीं सेवाराम के प्रिय भगवान, भगवान शंकर ही शिवाराम के रूप में मेरे पास आते थे और मेरे कहने पर वह दुकान का कार्य भी संभालते थे और मैं कैसा नादान ? भगवान की माया से भ्रमित हुआ अपने दोस्त को कभी कभी प्रेम से डांट देता था और वह शंकर भगवान हंसते-हंसते मेरी डाँट भी सुन लेते थे।

मन में यह चिंतन चल ही रहा था और सोचने लगा मैं अभी जाकर भगवान के दर्शन करता हूं और ऐसा सोच कर,वह अपने कार्यालय में गया। उसे लगा कि आज भगवान बैठे होंगे और जैसे ही अंदर गया वहां भगवान अंतर्ध्यान हो चुके थे और शिवाराम की जगह भगवान शंकरजी की रुद्राक्ष की माला उसके गल्ले पर पड़ी थी। उस माला को उठाकर उसने प्रणाम किया और कहने लगा -- मुझसे बड़ा अपराध हुआ है। शंकर भगवान मेरे पास आते थे पर मैं उन्हें पहचान नहीं पाया।

     रोने लगा, बड़ा जोर- जोर से रोने लगा और मन में निश्चय कर लिया कि भगवान शंकर का जो प्रसाद मुझे रुद्राक्ष की माला के रूप में मिला है। इसे मैं एक जगह स्थापित कर भगवान शंकरजी का मंदिर बनाऊंगा। कहते हैं, उस रुद्राक्ष की माला को एक जगह स्थापित कर एक छोटा सा राजस्थान के प्रांत में मंदिर बनाया गया।आजादी के पूर्व तक वहां पूजा चलती रहती थी। लोग आते थे पूजा करते थे।

कहते हैं कि एक  दिन एक जिद्दी अंग्रेज उस मंदिर के बाहर से गुजरा और उसे किसी ने बताया की यहां हिंदू लोग पूजा करने आते हैं और वह बड़ा नाराज हुआ।

अंदर गया और पूछने लगा --- किसकी पूजा होती है।
किसी ने कहा -- यह रुद्राक्ष की माला है जो भगवान शंकर के गले से गिर गई थी। इसे ही स्थापित करके पूजा की जाती है।

वह बड़ा जिद्दी था और उसने वहां से वह माला हटवा दी और कहा-- मैं इसे जला दूंगा। और एक चौक के बीच में अग्नि लगाकर उसने उस माला को उस आग में डाल दिया।

पर भगवान का चमत्कार हुआ। वह माला तो जल नहीं पाई। आग बड़े वेग से जलती रही, पर उस माला को रत्ती भर भी नुकसान नहीं हुआ।

यह देखकर अंग्रेज बड़ा विस्मित हो गया और रात को जब अपने घर सोने गया। तो भगवान शंकरजी के प्रकोप से उस अंग्रेज का सारा घर जल गया। उसके घर में कुछ भी नहीं बचा और भागता-भागता वह घर से बाहर आया।तब उसे किसी ने कहा --- अरे मूर्ख !! यह तूने क्या किया ?? भगवान को क्रोधित कर दिया है। जो माला तूने मंदिर से उठाई है, वापस जाकर उसे मंदिर में रख कर आ तभी तुझे शांति मिलेगी।  

और वह अंग्रेज वापस इस मंदिर में आया और उस माला को मंदिर के बाहर रखकर चला गया। कहते हैं उसके बाद वह माला वहां पर नजर नहीं आयी। पर इस बात में एक बात जरूर नजर आई कि भगवान अपने भक्तों के लिए स्वयं काम करने आते हैं। अपने भक्तों का मान रखने के लिए किसी भी कार्य को करने के लिए तैयार हो जाते हैं।

सेवाराम के लिए छह माह तक व्यापारी बनकर उसकी दुकान पर बैठे और अपने भक्त के वचन के लिए रोज मंदिर के जब पट बंद हो जाते थे तो 12 से 5 बजे तक, आकर मोतीराम के साथ दुकान पर बैठते थे। ऐसे हैं भगवान भोलेनाथ जो अपने भक्तों की हर मनोकामना पूर्ण करते हैं। विश्वास से सारे कार्य सिद्ध हो जाते हैं।इसलिए विश्वास रखना अपने परमात्मा पर। वह परमात्मा अपने भक्तों की हर मनोकामना अवश्य पूर्ण करते हैं। और यह विश्वास हमारे मन में  भी बना रहना चाहिए।

Post a Comment

Please do not enter any spam link in the comment box.

Previous PostNext Post