जब लड्डू गोपाल जी की मूर्ती से खून निकला और रोने लगे। 

Jab Laddu Gopal Ji Ki Moorti Se Khoon Nikala Or rone Lage.






                 उदयपुर के नज़दीक किसी क्षेत्र में चतुर्भुज भगवान का मंदिर था । देवाजी वहां के पुजारी थे । सच्चे भाव से अपने परमात्मा की सेवा करते थे । अपने भगवान को भोग लगाना, तैयार करना, उन्हें बड़ा पसंद था। उनका सारा समय परमात्मा की सेवा में जाता था । इस मंदिर की एक विशेषता यह थी कि उदयपुर के 'राणा जी' नित्य प्रति आकर मंदिर में प्रणाम करते थे । जब वह राणा जी मत्था टेकने आते तो देवाजी का नियम था -- वह भगवान के श्रीअंग पर चढ़ी हुई माला राणा जी को समर्पित करते थे। राणा जी उसे प्रसाद स्वरूप समझकर अपने गले में धारण कर घर  आते थे।

               अब रोज का नियम था राणा जी रोज आए, देवाजी भगवान को चढ़ी माला राणा जी को दे देते थे । एक दिन राणाजी को आने में समय लग गया । देवाजी विचार करने लगे । आज राणाजी आए नहीं क्या हुआ है ? और मुझे मंदिर भी बंद करना है । अब मंदिर बंद किया जाए या राणाजी का इंतजार किया जाए ??

            इस प्रकार विचारों का मंथन मन में चल रहा था। तभी देवाजी ने सोचा भगवान के कपाट तो बंद करना ही चाहिए, ऐसा सोचकर देवाजी ने मंदिर के कपाट बंद कर दिए । अभी मुख्य द्वार बंद करना ही था कि राणा जी का सिपाही भागते हुए आया और कहने लगा - देवाजी मुख्य कपाट बंद नहीं कीजिएगा । राणा जी दर्शन करने आए हैं । देवाजी ने कहा -- मैंने मंदिर तो बंद कर दिया है । अब राणा जी को चौखट पर ही दर्शन करने पड़ेंगे ।इतने में राणाजी मंदिर जी के अंदर आ गए कहने लगे -- मैं भगवान के चौखट के दर्शन ही करूंगा, क्योंकि मुझे प्रसाद स्वरूप तो माला पहनने को मिल ही जाती है। पर आज विचित्र घटना घटी । राणा जी को आने में समय था। जब तक राणाजी आने वाले थे, तब तक देवाजी ने भगवान के श्री विग्रह से माला उतार कर अपने नजदीक रखी थी। कि राणा जी आएंगे उन्हें दे दूंगा । पर राणा जी को आने में समय लगा । तो आज देवाजी ने वह माला अपने गले में धारण कि। उनके मन में सदा यह इच्छा रहती थी कि मैं भी तो उस माला को कभी पहनकर देखूं कि परमात्मा की माला का सानिध्य कैसा अनुभव कराता है । यह परमात्मा का प्रसाद है । यह मेरे जीवन में कितना परिवर्तन लाता है?
         देखो भक्तों की तो यही खासियत होती है, कि उन्हें परमात्मा की कोई भी वस्तु मिल जाए वह अपने से अधिक उसकी संभाल करते हैं। आज पहली बार देवाजी ने भगवान की माला को अपने अंगों से लगाया था।इसलिए उनका मन बड़ा प्रसन्न था पर अचानक से राणा जी आ गए  उनकी खबर सुनकर देवाजी ने वह माला अपने गले से उतार कर वापस उसी स्थान पर रख दी थी। अब जैसे ही राणाजी ने चौखट को प्रणाम किया।

राणाजी कहने लगे -- देवाजी मेरा प्रसाद, मेरी माला कहां है ? देवाजी ने वह माला उठाकर राणाजी को दी। राणाजी ने जैसे ही वह माला अपने गले में धारण की तो देख कर हैरान हो गए । उस माला के अंदर उन्हें एक सफेद बाल दिखाई दिया । राणा जी पूछने लगे --- देवाजी ! इस माला में सफेद बाल कैसे आ गया ?  राणाजी के सवाल को सुनकर, देवाजी भयभीत हो कांपने लगे। उनका मन डर से व्याप्त हो गया। अगर मैंने सच बता दिया कि --आज माला मैंने पहन ली थी । तो राणाजी मुझे सजा दे सकते हैं । ऐसा सोचकर देवाजी ने झूठ वचन कह दिया। कहने लगे -- मुझे तो पता नहीं ।

राणाजी ने कहा --- सच सच बताओ । क्या तुमने इस माला को अपने गले में धारण किया है ? 
देवाजी कहने लगे --- अरे ! मैं यह गुस्ताखी कैसे कर सकता हूं ? यह माला तो आपके लिए है।आप ही पहनते हो।
तो राणाजी ने कहा --- फिर इस माला में सफेद बाल कैसे आ गया ।
तब देवाजी कहने लगे --- आज भगवान के बाल सफेद थे ।
राणाजी क्रोधित होकर कहने लगे --- देवाजी, क्या बकते हो ? भगवान के बाल सफेद कैसे हो सकते हैं ? वह तो बिल्कुल काले हैं। पक्का आप ने ही इस माला को पहना है।

देवजी कहने लगे -- अगर आपको यकीन ना हो तो कल प्रातःकाल आकर देख लेना। मैं कहता हूं ना भगवान के बाल सफेद हैं। अब तो राणा जी को भी क्रोध आ गया । शास्त्रों में भी आया है। राज व्यक्ति साधारण नहीं होता है। राजा अगर किसी बात पर अड़ जाए तो जैसे तैसे ही पीछे हटता ही नहीं। अब राणा जी ने भी हठ कर लिया कल सुबह इसकी परीक्षा की जाएगी। अगर भगवान की मूर्ति के बाल सफेद ना होकर काले निकले तो तुम्हें सजा दी जाएगी। मेरा तो यकीन पक्का है यह माला तुमने पहनी है। उसके बाद मुझे समर्पित की है।
देवाजी कहने लगे --- तुम रखो परमात्मा पर। परमात्मा के बाल सफेद ही हैं। अब राणा जी तो क्रोधित होकर निकल गए। अब देवाजी विचार करने लगे। मैंने बोल तो दिया भगवान के बाल सफेद हैं। अब भगवान को याद कर के देवाजी के आंखों में आंसू आने लगे। वह रो कर परमात्मा को कहने लगे -‐ परमात्मा आज तो मेरी लाज आपने बचा दी। कल प्रातःकाल राणा अवश्य आएगा और वह देखेगा। अगर उसने देख लिया अगर आपके बाल सफेद नहीं है तो मुझे मृत्यू दंड देगा और मैं मारा जाऊंगा। मेरे मन में तो यही भाव था कि राणा रोज आपकी माला को स्वीकार करता है। आज मैं भी उसे अंग पर पहनकर यह अनुभव कर सकूं कि आप का सानिध्य कितना आनंद देता है।इसलिए मैंने उस माला को धारण किया था।

              हे ! भगवान अब आप मेरी रक्षा करना । और इस प्रकार प्रार्थना करते-करते, देवाजी को मंदिर के चौखट पर ही नींद आ गई। प्रातःकाल हुआ । देवाजी उठे और जैसे ही दादाजी ने आज स्नान करके अपने भगवान चतुर्भुज जी का मंदिर खोला मंदिर खोलते ही हैरान हो गए। जिस चतुर्भुज स्वामी जी के विग्रह को निरंतर काले बाल दिखाई देते थे।आज देवाजी की सच्ची प्रार्थना पर वह काले बाल सफेद हो चुके थे। आज राणाजी भी जल्दी से मंदिर में उपस्थित हो गए और कहने लगे -- देवाजी कहाँ हो ?

देवाजी हाथ जोड़कर कहने लगे --- मैं यहां पर हूं। कल तुमने कहा था कि भगवान के बाल सफेद है आज मैं स्वयं उनका निरीक्षण करना चाहता हूं, देखना चाहता हूं। और ऐसा कहकर राणा जी भगवान के विग्रह के नजदीक आए और राणा ने देखा कि भगवान के विग्रह के जो बाल हैं , वह सफेद हैं। राणा को लगा, हो सकता है - देवा जी ने अपने आपको बचाने के लिए भगवान के मस्तक पर जो नकली बाल लगाए जाते हैं। उन काले बालों को हटाकर सफेद बाल लगा दिए हैं। ऐसा मन में विचार कर रहा था। राणाजी ने भगवान के बाल खींचे। उन बालों को खींचते ही भगवान की मूर्ति के मस्तक से रक्त आना प्रारंभ हो गया। राणाजी देख कर हैरान हो गए। थोड़ा रक्त तो राणा जी के कपड़ों पर लग गया। राणा जी सोचने लगे -- यह क्या है ? यह बाल नकली नहीं। यह बाल तो भगवान के असली बाल हैं । और ऐसा सोचकर राणा को बड़ा दुख हुआ। राणा कहने लगा -- मुझे क्षमा करो, मुझसे अपराध हुआ है। तब उस समय वहां पर आकाशवाणी हुई। राणा तुमने बड़ा अपराध किया है। पहली बात तो तुमने अकारण ही मेरे सच्चे भक्त को दुख दिया है। दूसरी बात मेरे भक्त के मना करने के पश्चात भी तुम मेरे श्री विग्रह के नजदीक आ गये । तीसरी बात तुमने मुझ पर भी यकीन नहीं किया। मेरे मस्तक के बालों को खींचा है। आज के बाद कोई भी उदयपुर का राणा मेरे मंदिर में प्रवेश नहीं कर पाएगा। यह मेरा श्राप है। और इस प्रकार ऐसा कहकर वह आकाशवाणी विलुप्त हो गयी। राणाजी को तो बड़ा पश्चाताप हुआ। उन्होंने देवाजी से क्षमा मांगी।  
देवाजी से कहने लगे -- हमें क्षमा करो, हमें अभय दान दो, हमारी रक्षा करो । तब देवाजी ने पुनः परमात्मा से प्रार्थना की। हे परमात्मा !! हम तो अज्ञानी जीव हैं, हमसे अनेक भूलें होती हैं। राणा जी से भी भूल बन पड़ी है। इसे क्षमा करो। 

          भगवान की मूर्ति ने आदेश दिया। उदयपुर के सिंघासन पर जितने भी राणा विराजमान होंगे, वह दूर से दर्शन अवश्य कर सकते हैं पर मेरे नजदीक नहीं आ सकते। भगवान की यह बात सुनकर राणा जी प्रसन्न हो गए।
उधर देवाजी रोकर कहने लगे ---हे परमात्मा ! आज आपने मेरी लाज रखी, मेरी रक्षा की है । मेरी पुकार पर आप ने काले बालों को सफेद कर दिया। आपने नकली बालों को अपने मस्तक पर असली बना दिया । हे हरि! आप से अधिक करणामय कौन हो सकता है। तो परमात्मा अपने भक्तों की अवश्य लाज रखते हैं। विश्वास सच्चा हो, पुकार इतनी सच्ची हो कि परमात्मा तक पहुंचता जाए। और जब हमारे हृदय की पुकार परमात्मा तक पहुंचती है, तो वह स्वयं चले आते हैं। तो ऐसे भक्त वत्सल भगवान जो भक्तों के सदा सहायक हैं उनके पावन श्रीचरणों में हमारा बारंबार प्रणाम है, प्रणाम है, प्रणाम है।

Conclusion

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