Mythological Story - राधा नाम की महिमा (Radha Nam Ki Mahima)





एक बार एक संतजी किसी गाँव के निकट आश्रम पर भागवतजी की साप्ताहिक कथा कर रहे थे। तीसरे दिन के वृतांत में वह कथा करते हुए बताने लगे-- अनेक प्रकार के लोग जो पाप कर्म करते हैं उन्हें अनेक प्रकार के नर्कों में जाना पड़ता है, लेकिन एक उपाय है जिसके द्वारा नर्कों में जाने से बचा जा सकता है। कोई एक बार सच्चे ह्रदय से राधा नाम पुकार ले तो वह नर्कों में नहीं जाता है।  एक सेठ जी जो रोज आकर सत्संग सुना करते थे। सत्संग समाप्ति के पश्चात वह संत जी के चरणों में आकर बड़े जोर से रोने लगे। 


संत जी ने कहा -- अरे सेठ जी क्यों रोते हो ? तुम्हारा मन उदास क्यों है ?

सेठ जी रोते हुए कहने लगे -- भगवन् आपकी कृपा से मुझे सब कुछ प्राप्त है पर मेरे मन को एक बड़ी चिंता सताती है ।

संत जी कहने लगे -- कहिए कौन सी चिंता है ? 

सेठ जी कहने लगे --- आज आपने भागवत कथा में नर्कों का वर्णन किया और वर्णन करते हुए बताया कि जीवों को अनेक पापों से नर्कों की प्राप्ति होती है, लेकिन एक उपाय है जिसके द्वारा नर्कों में जाने से बचा जा सकता है तो प्रभु मैं तो आपकी शरण में हूँ, रोज सत्संग सुनने आता हूं। मेरे मन में तो यह विश्वास है-- आप संतो की कृपा से, भागवत की कृपा से मेरा उद्धार तो हो ही जाएगा। लेकिन मेरा एक छोटा भाई है जिसकी उम्र 50 साल है। वह ना सत्संग में जाता है, ना परमात्मा पर विश्वास करता है और ना ही प्रभु का नाम सुमिरन करता है। उसका उद्धार किस प्रकार होगा ? मुझे उसकी बड़ी चिंता सताती है। मैं उसे बहुत बार समझाने का प्रयास भी करता हूं। इस संसार के काम तो होते रहेंगे, तुम भगवान के नाम का स्मरण भी किया करो। तब वह कहता है--ऐसा करने से कुछ नहीं होता है तुम भी मत किया करो । मैं जितना आस्तिक हूँ, प्रभु के प्रति जितनी मेरी आस्था है। वह उतना ही कट्टर और अनीश्वर वादी है ।

तब संतजी ने कहा --क्यों चिंता करते हो, एक दिन उसका भी उद्धार हो ही जाएगा ।

सेठ जी रोते हुए कहने लगे --- हे भगवन् ! उसका उद्धार कब होगा ? आप जैसे महापुरुषों हमारे गांव में आए हैं।मुझे तो आप पर ही यकीन है। आप ही उसका उद्धार करके जाएंगे। अब आप कैसे भी कृपा कर मेरे घर आइए और एक बार तो उसके मुख से श्री राधा नाम का उच्चारण कराइए । तब सेठजी की विनय सुन, 

संत जी कहने लगे -- कल सत्संग समाप्ति के पश्चात मैं आपके घर आऊंगा और उसे परमात्मा का सुमिरन अवश्य कराऊंगा। 
दूसरा दिन हुआ, सेठ जी अपने घर गए। संत जी के आने का इंतजार करने लगे। आश्रम पर कथा की समाप्ति हुई।अब संतजी अपने वचन के अनुसार सेठ जी के घर पहुंचे, जैसे ही घर पहुंचे सेठ जी ने बड़े श्रद्धा भाव से संतों का स्वागत किया।

उन्होंने अपने भाई को बुला कर कहा --संत जी आज हमारे घर पधारे हैं, उनका दर्शन कर लो।

वह अंदर से बैठे-बैठे कहने लगा --- मुझे ना किसी संत से मिलना है और ना ही भगवान से मिलने की इच्छा है। तुम ही उनकी सेवा करो और तुम ही उनका पेट भरो ।

संतजी ने जब यह वचन सुने, सेठ जी रोते हुए कहने लगे--- भगवन जी देखा आपने। आपके सामने ही आपका अपमान कर रहा है।

संतजी कहने लगे --- सेठ जी ख्याल ना कीजिए । सब कुछ अच्छा होगा ।
अब सेठ को दिलासा देते हुए संत जी पलंग से उतरे और उसके भाई के कक्ष में आ गए और उसके कंधों पर हाथ रख कर कहने लगे -- और बताओ, आज तक कितना कमाया ।
वह संत जी को इस प्रकार अपने नजदीक देख कर कहने लगा --- अपना हाथ मेरे कंधों से हटाओ, मैं ना संतो को मानता हूँ, ना भगवान को मानता हूं। लोग जितने आस्तिक होते हैं, मैं उतना ही कट्टर नास्तिक हूँ। मैं भगवान को नहीं मानने वाला हूं। आप मेरे नजदीक क्यों आए हैं।

संत जी कहने लगे --- मैं तो अपना काम करने आया हूं।
संतों का काम होता है, लोगों का उद्धार करना। आज तुम्हारे उध्दार का कार्य मिला है, तो अवश्य करके ही जाऊंगा। वह सेठ का भाई भी बड़ा कट्टर था ।

वह कहने लगा --- आपको किसी का भी उद्धार करना है, कर लीजिए पर मेरा उध्दार आप नहीं कर सकते। मैं कुछ भी नहीं करने वाला हूं।
(सेठ के भाई को देखकर संतजी मुस्कुराकर) कहने लगे --- एक बार राधे राधे बोल दो।

वह (सेठ जी का भाई ) कहने लगा --- मैं कुछ नहीं बोलूंगा।

संतजी ने फिर कहा --- राधे राधे बोल दो।

वह कहने लगा ---नहीं कहूंगा।

फिर संत जी ने कहा ---- राधे राधे बोलो।

वह कहने लगा --- मैंने कहा ना, मैं नहीं बोलूंगा ।
तब संतजी, पुनः सेठ जी के पास आए और कहने लगे --- अब आपने मेरे ऊपर यह जिम्मा सौंपा है ।
अब मैं जैसा करूंगा, आप बीच में नहीं आना। आप सारे परिवार वाले बाहर जाकर बैठ जाओ। जब तक मैं आपको बुलाऊँ नहीं, एक भी परिवार वाला इस कक्ष में ना आए। अब इस प्रकार सेठ जी अपने परिवार सहित बाहर आकर बैठ गए। अब कक्ष में सिर्फ संतजी और सेठ जी का भाई था।

संतजी ने पुनः प्रेम से कहा --- अरे भैया एक बार राधे राधे बोल दो।

वह कहने लगा --- मैंने आप से मना किया ना मैं नहीं कहता हूं। ना भगवान को मानता हूं ना भगवान की बातें मानता हूं, मैं कट्टर नास्तिक हूं।

संतजी पुनः उसे प्रेम से हंसते हुए कहने लगे -- जितने तुम कट्टर नास्तिक हो, मैं उतना ही आस्तिक हूँ। मैंने अगर निश्चय कर लिया है, तुम्हारे मुंख से राधा नाम सुनकर ही जाऊंगा और पक्का समझ लेना कि तुम्हारे मुख से राधा का नाम निकलेगा ही।

वह कहने लगा -- आप कितना भी प्रयास कर लो, मैं एक बार भी नाम नहीं लेने वाला हूँ।
अब संत महापुरुष होते तो बड़े दयालू हैं पर लीला मात्र उन्होंने क्या किया --- उस सेठ के भाई का हाथ पकड़ा और हाथ पकड़कर जोर से घुमाने लगे।अब वह  सेठ ठहरा 50 साल का, वृद्ध अवस्था थी, संत भी वृध्द थे। पर संतों के अंदर भक्ति का तेज होता है। उन्होंने जोर से उसके भाई का हाथ घुमाया।

हाथ घुमाकर संत जी फिर कहने लगे -- कहो राधे-राधे।

वह कहने लगा -- नहीं कहूंगा।

अब तो संत जी ने जोर से हाथ घुमाकर सेठ के भाई को जमीन पर पटक दिया और खुद उसके पेट पर चढ़कर बैठ गए और 

संत जी फिर कहने लगे -- बोलो राधे राधे।

वह फिर कहने लगा-- नहीं कहूंगा।

अब तो संत जी ने उसके दोनों हाथ पकड़ उसके पैरों को बांध दिया और कहने लगे -- कहो राधे-राधे।
अब ऐसी अवस्था में, वह सोचने लगा लगता है, यह संत तो मुझे मार ही देंगे। तब उसने बिना इच्छा के एक बार ऐसे ही कह दिया -- राधे-राधे। जैसे ही उसने राधे-राधे कहा। संतजी ने उसके हाथ पैर खोल दिए।

उसके बंधनों को छोड़कर बाहर आकर कहने लगे--- सेठ जी आप का कल्याण हो गया, आपके भाई का भी कल्याण हो गया।

सेठजी कहने लगे --- अंदर से बहुत तेज आवाजें आ रही थी।

तब संतजी कहने लगे --- आपने काम ही ऐसा दिया था। आपने कहा - वह नास्तिक है, कभी कुछ बोलता ही नहीं है। आज आपके भाई ने राधे राधे का नाम उच्चारण कर लिया है। इसका कल्याण हो गया। अब मैं जा रहा हूं। कल से पुनः मेरी कथा है। अब संतजी तो अपने स्थान पर लौट आये।

सेठ का भाई जमीन से उठकर अपने भाई से कहने लगा -- यह कैसे संत हैं ? मुझसे झगड़ा करने आ गए, मेरे ऊपर चढ़कर बैठ गए और  कहने लगे अगर राधे राधे का नाम उच्चारण नहीं करोगे, तो मैं तुम्हारे ऊपर ऐसे बैठे रहूँगा।अब उसकी बातें सुन सेठ जी तो हंसने लगे।

वह हंसते हुए मन से भगवान को धन्यवाद देते हुए कहने लगे --- हे प्रभु !आपके संत भी बड़े दयालु हैं। खुद कष्ट सहकर भी लोगों का कल्याण करते हैं।
समय व्यतीत होता गया। मुश्किल से पांच छः महीने गुजरे होंगे। अचानक एक दिन छोटे भाई का देहांत हो गया। शरीर समाप्ति के पश्चात आत्मा शरीर से अलग हो जाती है, वह आत्मा ही ऊपर यमराज के पास जाकर सारे हिसाब-किताब देती है। अब इस व्यक्ति का हिसाब- किताब खोला गया।

यमराज ने चित्रगुप्त से कहा --- जो आज इंसान हमारे पास लाया गया है, इसका हिसाब क्या है ?

चित्रगुप्त कर्मों का हिसाब देखकर बताने लगा -- हे भगवान ! इसने अपने जीवन में कभी परमात्मा का नाम सुमिरन नहीं किया है। सदा पाप ही पाप किये हैं। इसे तो सीधे नर्क भेज दिया जाए। अब यमराज के आदेश अनुसार जैसे ही उसे नर्क भेजा जा रहा था, तभी 

चित्रगुप्त ने कहा -- भगवन, एक बात और है।

यमराज जी ने कहा --- कौन सी बात ?

चित्रगुप्त ने कहा -- भगवन एक बार संतो के कहने पर इसने राधा नाम का उच्चारण किया था। 
अब एक बार राधा नाम का उच्चारण ?

यमराज ने दूतों से कहा --- थोड़ी देर रूक जाइए। इसका हिसाब किया जाएगा। इसके बाद ही इसे नर्क में भेजा जाएगा।

यमराज ने पुनः चित्रगुप्त से कहा --- जल्दी से इसका हिसाब देखो और कहीं इसने परमात्मा का नाम उच्चारण तो नहीं किया है ?

चित्रगुप्त ने फिर से पुनः सारा हिसाब देखा और देखकर कहने लगे --- भगवन ! इसने एक बार जो नाम उच्चारण किया है, वह संतो के भय से किया था, दिल से भी नहीं किया था। पर एक बार राधा नाम का उच्चारण किया है।
अब यमराज जी विचार करने लगे कि अब एक बार राधा नाम का उच्चारण और सारा जीवन पाप में, अब क्या किया जाए ?
 
तब यमराज ने उसी इंसान से पूछा -‐ एक बात बताओ, हम तुम्हें पहले राधा नाम उच्चारण का फल दें या तुम्हें नर्कों में भेज दिया जाए ?


तब वह भक्त हाथ जोड़कर कहने लगा-- भगवन नर्क में तो जाना ही है। इससे अच्छा है, आप मुझे एक बार राधा नाम उच्चारण का फल दे दो। फिर मुझे जहां चाहो भेज देना।
अभी यमराज जी अपनी पुस्तक खोल कर देखने लगे, कि एक बार राधा नाम उच्चारण का फल क्या है ? उन्होंने सारी पुस्तकें खोल दी पर उन्है कहीं फल दिखाई नहीं दिया। तब वह विचार करने लगे एक बार राधा नाम उच्चारण का फल तो मुझे पता ही नहीं है। तब वह अपनी शंका के निवारण करने के लिए उस भक्त को अपने साथ लेकर स्वर्ग लोक में आ गये।

स्वर्ग में आकर यमराज ने इंद्रदेव से कहा --- हे इंद्रदेव ! मुझे बताइए एक बार राधा नाम उच्चारण करने का क्या फल है ?
तब इंद्रदेव ने बहुत प्रयास किया पर उन्हें भी इसका फल पता नहीं चला। तब वह सब देवता मिलकर ब्रह्मदेव के पास आए। ब्रह्मदेव ने जब उन सबको देखा।

तब ब्रम्हदेव उनसे पूछने लगे --- यह आपके साथ इन्सान कौन है ?

तब इंद्र देव कहने लगे --- भगवान इसने एक बार राधा नाम का उच्चारण किया है बाकी सारा जीवन इसने पाप किया है। हमें तो पता नहीं राधा नाम उच्चारण का फल क्या है ? इसलिए हम आपके पास आए हैं।
तब ब्रह्माजी ने भी बड़ा प्रयास किया, राधा नाम उच्चारण का फल क्या है ? अब उन्है भी पता नहीं चला।

तब वह ब्रम्हदेव कहने लगे ---- हम सब मिलकर इसे अपने साथ लेकर, भगवान शंकर जी के पास चलते हैं। तब वह भगवान शंकर जी के पास पहुंचे।

भगवान शंकर जी से प्रार्थना कर कहने लगे -- हे महादेव ! इस इंसान ने सारा जीवन पाप किया है। बस एक बार संतो के कहने पर राधा नाम का उच्चारण किया है। अब आप बताइए, एक बार राधा नाम उच्चारण का क्या फल मिलता है ?

तब महादेव जी ने बड़ा प्रयास किया पर वह भी राधा नाम की महिमा को बता नहीं सके।

तब शंकर जी कहने लगे --- अब हमें भगवान श्री कृष्ण के पास चलना पड़ेगा, क्योंकि वही राधा तत्व को जानते हैं।
ऐसा सोचकर सब देवी देवता भगवान शंकर के साथ मिलकर उस इंसान की आत्मा को लेकर, भगवान श्री कृष्ण के गौ-लोक धाम में पहुंचे। गौ-लोक धाम में, भगवान श्री कृष्ण राधा जी के साथ अपने आसन पर विराजमान थे।
भगवान श्री कृष्ण ने सब देवी देवताओं का सम्मान किया और उनसे पूछा आज अचानक से आने का कारण क्या है ?

तब भगवान शंकर हाथ जोड़कर कहने लगे--- हे भगवन ! यह इंसान इसे धरती से लाया गया है। इसने अपने जीवन में अनेक पाप किए हैं, पर एक बार राधा नाम का उच्चारण किया था। यमराज जी पता न कर सके कि एक बार राधा नाम उच्चारण का फल क्या है। तब वह इसकी जानकारी लेने के लिए इसके साथ इंद्रजी के पास स्वर्ग में आए थे। फिर स्वर्ग से होते हुए ब्राह्मलोक आए। फिर ब्रह्मलोक से होते हुए यह मेरे पास पहुंचे। अब मैं इन सबको अपने साथ ले आपके पास लेकर आया हूं, अब आप बताइए एक बार राधा नाम उच्चारण का क्या फल हो सकता है।

जब इस प्रकार बातें चल रही थी तब श्रीकृष्ण के पास बैठी राधा रानी बड़े जोर से हंसने लगी। 

तब श्रीकृष्ण ने कहा --- हे राधिका; क्यों हंसती हो ?

तब राधिका कहने लगी -- हे भगवन ! यह अभी तक राधा नाम का महत्व समझ नहीं सके हैं।

तब भगवान शंकर जी कहने लगे -- हे महारानी ! राधिका के नाम का क्या असर है, आप हमें बताइएना। 

तब राधिका जी कहने लगे -- हे महादेव ! आप खुद सोचिए । इस व्यक्ति ने एक बार राधा का नाम जपा। वह एक बार राधिका के नाम जपने से स्वर्ग लोक की सैर करके आया, ब्रह्मदेव का ब्रह्मलोक में दर्शन करके आया, आपके महादेव लोक में आपका इसने दर्शन किया है। आज एक बार उच्चारण के प्रभाव से यह आप सबको साथ लेकर हमारे गौ-लोक धाम में आया है। मेरे दर्शन और श्री कृष्ण का पूजन कर रहा है। इससे अधिक राधा नाम का और फल क्या हो सकता है ? जब राधिका जी ने इस प्रकार, एक बार राधा नाम का पूरा महत्व बताया तो 

यमराज कहने लगे --- यह तो बड़ा अनंत फल है, जो व्यक्ति नर्कों में जाने वाला था, वह एक बार उच्चारण से सब लोकों की यात्रा कर, भगवान श्री कृष्ण और राधा रानी के चरणों में उपस्थित हो गया है। इससे अधिक फल और क्या हो सकता है। 

तभी फिर से यमराज कहने लगे --- भगवन ! क्या अब इसे नर्कों में जाने की आवश्यकता नहीं है ?

तब श्रीकृष्णजी कहने लगे -- हे धर्मराज ! जिसने एक बार राधा रानी के चरणों का दर्शन कर लिया हो, वह तो कभी नर्क में जा ही नहीं सकता है।

तब वह भक्त जो वहां पर राधा रानी के दर्शन कर रहा था, वह कहने लगा --- हे महारानी, मैंने तो संतो के भय में आकर आपका राधा नाम उच्चारण किया था। पर जो सच्चे हृदय से आपके नाम का उच्चारण करते हैं, उन्हें तो जीवन में कोई भय होगा ही नहीं। वह तो नर्कों की यात्रा में कभी निकलेंगे ही नहीं, वह तो सीधा आपके चरणों में ही समा जाएंगे। तो इतना महत्व है -एक बार राधा नाम के उच्चारण का।
तो सच्चे ह्रदय से जो एक बार इस प्रकार कह दे--- ""राधे-राधे, श्याम-मिलादे"" तो राधा नाम का उच्चारण करते ही परमात्मा का साक्षात दर्शन हो जाता है।



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