Ek Sant Ne Jab Hiran Ko Sher Bana Diya - Satya Ghatna



               उज्जैन के नजदीक स्वामी रामानंद महाराज जी के एक परम शिष्य भक्त सुखानंद जी थे। जिनका जन्म उज्जैन के नजदीक एक कीरतपुर गांव में जानकी नवमी के दिन हुआ था। इनके पिताजी का नाम श्री त्रिपुरारी भट्ट और माताजी का नाम गोहावरी बाई था। बचपन से ही भक्त सुखानंद जी बड़े आध्यात्मिक प्रवृत्ती वाले थे। प्रारंभिक अवस्था में ही इन्होंने अनेक चमत्कार दिखाना प्रारंभ कर दिया। मातापिता ने इनका नाम चंद्रहरी रखा था। एक बार भक्त सुखानंदजी जब तीन वर्ष की अवस्था के थे तो अपनी माता की गोद से उतरकर एक पेड़ के पीछे जाकर छुप गए। जब इनके पिता इन्हें ढूंढने लगे तो वह देख कर हैरान हो गए। जिस वृक्ष के नीचे यह छिपे बैठे थे उस वृक्ष के नीचे एक बड़ा भारी सांप था और वह सांप इनके ऊपर अपना फन फैलाकर बैठ गया। यह देखकर इनके पिताजी तो बड़े भयभीत हो गए।

वह कहने लगे - हे नाग देवता ! मेरे पुत्र पर दया करो इसे छोड़ दो।
कहते हैं वह सांप सुखानंद जी के चरणों का स्पर्श कर पुनः बिल में चला गया।

              पिताजी ने भागते हुए अपने पुत्र को हृदय से लगाया और सुखानंद जी की मां के पास आकर कहने लगे, अपने बेटे का ध्यान रखा करो। आज एक नाग इसके ऊपर फन फैलाकर बैठ गया था। माताजी कहने लगी कोई बड़ी बात नहीं है वह नाग देवता रोज आकर  चंद्रहरि के चरणों का स्पर्श करके जाता है।अपनी धर्मपत्नी की बात सुनकर भक्तराज के पिताजी बड़े विस्मित हो गए।
              धीरे-धीरे दिन व्यतीत होने लगे। अब सुखानंद जी अपने पिताजी की आज्ञा से विद्यालय जाने लगे। अपनी तीव्र बुद्धि से इन्होंने थोड़े समय में वेदों का समयक ज्ञान प्राप्त कर लिया था। एक बार इन्होंने अपने गुरुजी से कहा - है गुरुदेव ! मुझे उस अक्षर का ज्ञान कराइए जिसके ज्ञान के पश्चात किसी अन्य ज्ञान की आवश्यकता नहीं होती है।

                छोटे बालक की ऐसी बातें सुन इनके विद्या गुरू इनके पिताजी से कहने लगे -- आपका यह बेटा कोई साधरण बालक नहीं है। यह दिव्य महापुरुष है। किसी कारण बस आपके पास जन्म लेकर आया है। आप इसका अच्छे से ध्यान रखना। अब तो माता-पिता अच्छे तरीके से अपने बालक की देखभाल ओर संभाल करने लगे।

                एक दिन एक महान ज्योतिष भक्त सुखानंद जी के घर पर आए। उन्होंने सुखानंद जी को देखकर उनके माता-पिता से कहा -- एक बात याद रखना,  यह बालक परम बैरागी महापुरुष है। यह तुम्हारा घर कभी भी छोड़ कर जा सकता है। तब सुखानंद जी के पिताजी कहने लगे ‐- हे ज्योतिष महाराज ! ऐसा कोई उपाय बताइए जिससे कि यह हमें छोड़कर ना जाए।

                तब ज्योतिष आचार्य ने कहा - आप ध्यान रखना कभी यह अपनी सूरत पानी में या दर्पण में ना देखे। जिस दिन यह अपना मुख दर्पण या जल में देख लेगा उसी दिन यह घर छोड़कर चला जाएगा। अब तो पिताजी और माताजी इसका इतना ध्यान रखते थे कि पुत्र का ध्यान कभी दर्पण की ओर जाए ही नहीं।

               एक दिन भक्त सुखानंद जी के पिताजी क्षिप्रा नदी में स्नान करने गए थे। तभी एक ब्रह्मण कुमार इनके घर पर आकर कहने लगा - है सुखानंद ! तुम्हारे पिताजी कहां गए हैं?

               तब ब्रह्मण कुमार को देखकर भक्त सुखानंदजी ने पूछा - आप किस कार्य हेतू आए हैं? मेरे पिताजी तो शिप्रा नदी में स्नान करने गए हैं। तब वह ब्राह्मण कुमार कहने लगा - मैं आपके पिताजी से कर लेने आया हूं।

               तब पाँच वर्ष की अवस्था के भक्त सुखानंदजी पूछने लगे - मेरे पिताजी को किस बात का कर अदा करना है ? तब वह कहने लगा - तुम्हारे पिताजी मेरे पिताजी से शास्त्रार्थ में हार गए थे। इसलिए अब उन्हें हर माह कर देना पड़ता है, क्योंकि यहां की रीत है जो पंडित शास्त्रार्थ में हार जाता है, वह कर स्वरूप जीतने वाले को धन की राशि अदा करता है।
              जब भक्त सुखानंद जी ने यह बात सुनी तो उन्होंने उस ब्रह्मण कुमार से पूछा - तुम्हारे पिताजी का नाम क्या है ? तब वह ब्रह्माकुमार कहने लगा - मेरे पिताजी का नाम है श्री रंगराथ जी। वह उच्च कोटि के महाविद्वान पंडित हैं। तब सुखानंद जी ने कहा - अपने पिताजी से जाकर कह देना चार दिन बाद मैं उनसे शास्त्रार्थ करने आऊंगा। अगर वह उसमें हार गए तो उन्हें कर्ज चुकाना पड़ेगा। वह ब्रह्मणकुमार छोटे बालक की बातें सुनकर हैरान हो गया।

               पंडित रंगराथ जी का पुत्र अपने घर आकर अपने पिताजी से कहने लगा ‐ आज मैं श्री त्रिपुरारी भट्टजी से आपका कर लेने गया था। उसके छोटे पुत्र सुखानंद ने आपको शास्त्रार्थ के लिए आमंत्रित किया है। उसने कहा है सारी सभा के मध्य चार दिन बाद वह आपसे शास्त्रार्थ करेगा।

               पहले तो श्रीरंगराथजी को विश्वास नहीं हुआ पर जैसे ही चौथा दिन हुआ भक्त सुखानंद जी पाँच वर्ष की अवस्था में प्रातः काल गांव के विद्वान पंडितों को लेकर रंगराथजी के पास शास्त्रार्थ करने चले गए।

                अब जैसे ही शास्त्रार्थ प्रारंभ हुआ रंगरांथ के सभी सवालों का भक्त सुखानंदजी जवाब देते गए, पर जैसे ही भक्त सुखानंदजी ने सवाल करना प्रारंभ किया रंगराथजी एक भी सवाल का उत्तर ना दे पाए। सारी सभा में अब तो सुखानंदजी की जय जयकार होने लगी। जब सुखानंद जी के पिताजी को यह बात पता चली कि मेरा पुत्र पाँच वर्ष की अवस्था में शास्त्रार्थ में जीत गया है तो उन्होंने अपने घर पर एक बड़ा उत्सव किया। उस उत्सव में बड़े-बड़े विद्वान पंडितों को आमंत्रित किया गया था।

                 उत्सव चल रहा था, उस उत्सव को सजाने के लिए अनेक दर्पणों की सजावट की गई थी। तभी अचानक से एक दर्पण को देखकर भक्त सुखानंदजी वहां ठहर गए। उन्होंने जैसे ही अपना मुख उस दर्पण में देखा, उसी समय अपने पिताजी के पास आकर कहने लगे - पिताजी, मैं अब आपके पास नहीं रह सकता।

                अब तो पिताजी को ज्योतिषाचार्य कि वह बातें याद आ गई, जो उसने कहा था अगर आपके पुत्र ने दर्पण में अपना मुख देख लिया तो वह आपके घर नहीं रह पाएगा। पिताजी ने बहुत प्रयास किया सुखानंद को रोकने का पर सुखानंद नहीं माने। वह कहने लगे - पिताजी ! अब मैं आपके पास बिल्कुल भी नहीं रुक सकता हूं। अब मेरा मन संसार से भर  गया है। अब मुझे सब छोड़कर परमात्मा की खोज में जाना है। पिता ने बहुत आग्रह किया समझाने का बहुत प्रयास किया पर सब कुछ छोड़कर सुखानंद जी परमात्मा की खोज में वन की ओर निकल चले। माता-पिता को बड़ी चिंता होने लगी। कहा - पाँच वर्ष का बालक इस प्रकार वन में कहां घूमेगा, उन्होंने अपने विश्वासपात्र व्यक्ति को सुखानंद जी के साथ भेज दिया। उस व्यक्ति का नाम था श्री पंचकोलीजी। पंचकोली जी सदा सुखानंदजी के साथ रहते थे।

                कहते हैं एक दिन भक्त सुखानंद जी आराम कर रहे थे। तभी उन्हें सपने में किसी महापुरुष की आवाज सुनाई दी। वह महापुरुष कह रहे थे हि सुखानंद तुम काशी नगरी में आ जाओ, मैं काशी नगरी में ही तुम्हारा इंतजार कर रहा हूं।
                अब जैसे ही प्रातः काल हुआ सुखानंदजी ने सारी बात अपने साथी पंचकोलीजी को बतायी, पंचकोलीजी समझ गए कहने लगे - जिस महापुरुष ने तुम्हें आवाज दी है वह काशी के महान महापुरुष हैं स्वामी रामानंद जी। अब तो रामानंदजी की खोज में पंचकोलीजी और सुखानंद जी निकल चले। वन के मार्ग में चलते-चलते भक्त सुखानंदजी को श्री रामभारतीजी के दर्शन मिले। उन्होंने रामभारती जी को देखकर साष्टांग प्रणाम किया, सन्यासी रामभारती सुखानंद जी को देखकर कहने लगे - तुम उच्चकोटि के महापुरुष हो, तुम्हें अष्टांग योग आना अति आवश्यक है। मैं तुम्है अष्टांग योग सिखाना चाहता हूं। थोड़े समय में ही सुखानंद जी ने श्रीरामभारती सन्यासी से पूरा आष्टांग योग सीख लिया। सन्यासी से आष्टांगयोग की शिक्षा ले भक्त सुखानंदजी ने काशी की यात्रा प्रारंभ की।

                 अब तो वन कंद्राओं को खोजते खोजते भक्त सुखानंद जी काशी की नगरी में पहुंचे। काशी की नगरी में पैर रखते है उन्हें ऐसा अनुभव होने लगा जैसे की यह नगरी बहुत समय से मेरा इंतजार कर रही थी। यही मेरा अंतिम मार्ग है।

                  ऐसा सोच वह रामानंदजी का पता पूछ स्वामी रामानंद आश्रम पर पहुंचे। स्वामी रामानंद जी ने जैसे ही सुखानंद जी को देखा उन्होने सुखानंदजी को हृदय से लगा लिया और कहने लगे कितने वर्षों से मैं तुम्हारा इंतजार कर रहा था। तुम्हें आने में देर हो गई। भक्त सुखानंद जी हाथ जोड़कर कहने लगे - हे गुरुदेव ! जब तक ज्ञान जागृत नहीं हो जाता है तब तक जीव माया में ही फंसा रहता है पर आपकी कृपा से जैसे ही ज्ञान जागृत हुआ मैं आपकी खोज में  निकल चला था। अब आप मुझे अपनी शरण में रखो, मुझे अपने चरणों की सेवा से कभी दूर मत करना। सुखानंद जी की इतनी प्रेम भरी प्रार्थना सुन स्वामी रामानंदजी ने उन्हें श्रीराम मंत्र की दीक्षा दे दी। अब तो भक्त सुखानंद जी चित्रकूट के रामसैया नामक स्थान पर रहते हुए भजन सुमिरन करने लगे।

                भक्त सुखानंदजी एक महान सिद्ध महापुरुष हुए, उनके चमत्कारों की अनेक कहानियां जगत में प्रसिद्ध हैं।परंतु उन्होंने जो चमत्कार किए वह प्रसिध्दी पाने के लिए नहीं थे। वह तो लोगों के कल्याण के लिए थे।

                एक बार की बात है यह एकांत वन में परमात्मा का स्मरण कर रहे थे। सुमिरन करते करते इनके मुख से गोरी राग में भजन बनना प्रारंभ हो गया। उस भजन को सुन उस जंगल के अनेक जीव-जंतु इनके पास आकर इकट्ठा हो गए। जितने हिरण वहां से भाग रहे थे वह इनकी मधुर आवाज सुन इनके पास आकर खड़े हो गए। इन्है तो कुछ ध्यान ही नहीं था, अचानक से हिरण के चिल्लाने की आवाज आई।

                उस आवाज को सुनकर भक्त सुखानंदजी का ध्यान भंग हो गया। तब उनका ध्यान एक राजकुमार की ओर गया जो हाथ में तीर लिए हिरण का शिकार करने वाला था। उन्होंने राजा को रोकते हुए कहा - है राजकुमार !  इन हिरणों का शिकार नहीं करो यह जीव हत्या है। इस पाप से अपने आप को बचा लो, पर उस राजकुमार इन संतो की बात नहीं मानी। उसने इनकी बात को सुनकर भी अनसुना कर दिया और एक तीर हिरण के ऊपर छोड़ दिया। इन्होंने अपनी योग शक्ति से उस तीर को रोक लिया और एक हिरण को आदेश दिया कि है हिरण अब तुम सिंह बन जाओ और सिंह बनकर इस राजकुमार पर आक्रमण करो। जैसे ही इन्होंने उस डरते हुए हिरण को आदेश दिया वह हिरण अचानक से शेर के रूप में परिवर्तित हो गया और वह राजकुमार के पास जाकर जोर से गजकारने लगा। शेर की आवाज सुन वह राजकुमार वहीं मूर्छित हो गया। तभी उस समय सुखानंद जी ने पुनः शेर को आदेश दिया अपने रूप में परिवर्तित हो जाओ। सुखानंद जी का आदेश मान वह शेर पुनः हिरण के रूप में परिवर्तित हो गया, अब तो वह राजकुमार भागते हुए सुखानंद जी के चरणों में आ प्रार्थना कर कहने लगा - महाराज मुझे क्षमा करो मुझसे बड़ा अपराध हुआ है।

                  तब उस राजकुमार को क्षमा करते हुए भक्त सुखानंदजी कहने लगे - आज के बाद किसी जीव की हिंसा नहीं करना क्योंकि सब मैं परमात्मा व्याप्त होता है। हमें परमात्मा के जीवों को मारने का कोई अधिकार नहीं है। भक्त सुखानंद का ऐसा चमत्कार देख वह राजकुमार अब तो सुखानंद जी का शिष्य बन गया।
 
                    एक बार संतो की मंडली के साथ भक्त सुखानंद जी किसी गांव में गये। अब सुखानंद जी का नियम था वह तो किसी से कुछ मांगते नहीं थे। परमात्मा की कृपा से जो मिल जाए उसी से अपना जीवन यापन करते थे। संतों ने कहा - हे गुरुदेव ! हमें भूख लगी है, हम भोजन लेकर आएं। सुखानंद जी ने कहा - हमारा नियम है गांव के लोगों से मांगते नहीं है। गांव के लोगों को जब दया आती है तब वह स्वतः ही देकर जाते हैं। पर यह  गांव बड़ा निराला था। यहां के लोग संतों की सेवा करते ही नहीं थे। प्रातःकाल से लेकर शाम का समय हो गया, गांव का एक भी व्यक्ति संतों के लिए भोजन लेकर नहीं आया। तब भक्त सुखानंद जी ने गोरी राग में भजन गाना प्रारंभ किया। उस राग को सुनकर कहते हैं गांव के जितने लोग थे स्वतः ही  भक्तराज के समीप आने लगे। भजन में इतनी मधुरता थी कि उस भजन को सुनकर सब वहीं पर स्थिर हो गए। जब वह भजन पूरा हुआ तब वह गांव के निवासी भक्त सुखानंद जी से क्षमा मांगते हुए कहने लगे हमसे बड़ा अपराध हुआ है। आज सुबह से लेकर आपने कुछ खाया नहीं है। अभी हम आपके लिए भोजन बनाकर लाते हैं। तब उस समय सारे गांव वाले अपने हाथों से भोजन बनाकर लेकर आए और उन्होंने संतो को भोजन कराया। जब सब संत तृप्त हो गये तब वह गांव वाले कहने लगे - आज हमसे बड़ा अपराध हुआ। आप सारा दिन हमारे पास रहे पर हमने आपको भोजन भी नहीं कराया।

                   तब भक्त सुखानंद जी ने कहा भगवान के भक्त तुम्हारे पास आते हैं और तुम उनकी सेवा नहीं करते हो, यह कार्य अच्छा नहीं है।

गांव के लोग कहने लगे - महाराज आगे से कभी ऐसा अपराध नहीं होगा। अब हमारे गांव में जो संत आएंगे हम उनका अच्छे भाव से आदर मान करेंगे।

                  इस प्रकार गांव के लोगों को ज्ञान दे सुखानंद जी अपने स्थान पर पुनः वापस लौट आए। जब भक़्त सुखानंद जी का भगवत धाम जाने का समय हुआ तो अंतिम अवस्था में जब उनके प्राण ब्रह्मरंध्र में स्थित हो गये। तो उस समय साक्षात हनुमान जी प्रकट हो गये और हनुमान जी का ध्यान करते-करते सुखानंद जी के प्राण हनुमानजी के चरणों में ही लीन हो गए।

अनेक लोगों का कल्याण करके भक्त सुखानंदजी इस नश्वर संसार की यात्रा पूर्ण कर भगवान के परमधाम की ओर प्रस्थान कर गए।

तो ऐसे भगवान के पावन श्री चरणों में हम बारम्बार  प्रणाम करते है।

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