Jab Sanwariya Sarkar Bhakt ko Bachane Khud Jail Me Aa Gaye


श्री कृष्णजी के वैसे तो बहुत सारे अनन्य भक्त हैं पर हम आज यहाँ उनके एक परम भक्त सेवाजी की धर्मनिष्ठ भक्ती के बारे में बताने जा रहे हैं। जिनकी संत सेवा में बड़ी निष्ठा थी। सेवाजी के घर पर अधिकतर संतों की मंडली आती रहती थी। संपूर्ण समाज में इनकी बड़ी प्रतिष्ठा थी। लोग इन्हें यही कहते थे अगर हमारे राज्य में कोई संत आएगा तो उनकी सच्चे ह्रदय से अगर कोई सेवा कर सकता है तो वह सेवाजी हैं। समाज में सेवाजी का बड़ा नाम था, संत लोग भी इनका आदर करते थे। पर कहते हैं ना जहाँ आदर मिलता है, उस आदर को देखकर कुछ ऐसे लोग भी होते हैं जो भक्तों से बड़ी ईर्ष्या रखते हैं, ऐसा ही इनके साथ हुआ।

एक दिन इनके  घर पर कोई महापुरुष आए, सेवाजी की इस प्रकार साधुसंतो की सेवा, मानसम्मान, आदर करने के भाव को देखकर वह महापुरूष बड़े प्रसन्न हुए। वह महापुरुष जाते समय सेवाजी को ऐसा आशीर्वाद देकर गए कि, सेवाजी के पास कभी ना धन की कमी आयी ना कभी अन्न की कमी आयी। इन्होंने भी अपने जीवन में ऐसा नियम बना लिया था कि जब तक वह संतो को भोजन ना करा दें यह भी भोजन नहीं करते थे।

एक बार इनकी प्रतिष्ठा से ईर्ष्या  करने वाले लोगों ने वहां के राजा से इनकी शिकायत कर दी। अब राजा भी दुर्बुद्धि और बड़ा अविवेकी था, उसे अपना तो कुछ ज्ञान था नहीं। तो उसने संतो से ईर्ष्या करने वालों की बातें सुनकर उनकी बातों में लगकर सेवाजी को जेल में डाल दिया और जेल में बंद कर दिया गया।

सेवाजी को जेल में जाने की चिंता तो नहीं थी पर वह मन में एक ही चिंतन कर रहे थे कि अगर मेरे घर पर कोई महापुरुष आएंगे तो उनकी सेवा कौन करेगा? कौन उनको सच्चे भाव से प्रसादी खिलाएगा? ऐसे संत महापुरुष  बिना खाए मेरे घर से निकल ना जायें, ऐसा सोचकर उनकी आंखों में पानी आने लगा। 

तभी किसी व्यक्ति ने सेवाजी को बताया कि सेवाजी, आज तो आपके घर पर बहुत बड़े महापुरुष आए हैं, आपकी धर्मपत्नी और आपके पुत्र उनकी सेवा कर रहे हैं। 

उन्होंने आपके लिए पूछा था कि -- सेवा जी कहां है ? जब वह व्यक्ति इस प्रकार सेवाजी को संतजी के बारे में बता रहा था तभी सेवाजी ने आंखें बंद करके प्रभु से कहा -- हे प्रभु ! काश मेरी यह बेड़ियां खुल जाती, मेरे पंख लग जाते तो मैं उन संतों की जाकर सेवा करता । 

परमात्मा से अपने भक्त का दुःख देखा नहीं गया और जेल में एक विचित्र चमत्कार हुआ। अपने आप सेवाजी के बंधन खुल गए। उनके हाथों में जो जंजीर डाली गई थी वह जंजीर टूट गई। जेल के फाटक खुल गए। जो सिपाही कारागार का ध्यान रख रहे थे उन्हें भी नींद आ गई। सेवाजी सोचने लगे -- यह तो भगवत कृपा हुई है। ऐसा सोचकर वह अपने आप अपने घर पर पहुंच गये। घर पहुंच कर उन्होंने उन संतों की सेवा की। संत जी पूछने लगे -- सेवाजी तुम्हें तो जेल में बंद किया गया था। इस रात्रि में आप अपने घर कैसे आ गए ?

सेवाजी कहने लगे -- आप संतों का आशीर्वाद है, परमात्मा की कृपा से ही मेरे बंधन खुल गये और मैं आपकी सेवा में उपस्थित हो पाया हूं, संत जी भी पूर्ण संत थे।

उन्होंने कहा -- तुम्हारे ऊपर ऐसी कृपा सदा बनी रहेगी।

अब दूसरे दिन प्रातः काल जेल के कुछ कर्मचारी भागते हुए राजा के पास गए और कहने लगे -- कल सेवाजी जेल के बंधन तोड़ कर घर चले गये हैं। हमें आज्ञा दीजिए, हम उसके साथ क्या करें।

राजा ने आदेश दिया -- जल्दी जाकर उसे बांधकर जेल में पुनः बंद कर दो।

अब राजा के सिपाही सेवाजी के घर गए। जैसे ही राजा के सिपाही सेवाजी को हथकड़ी लगाने लगे। वैसे ही प्रभु की कृपा से सेवाजी के शरीर से ऐसी रोशनी निकली कि वह सिपाही वहीं पर बेहोश होकर गिर गए। अन्य लोग देखकर हैरान हो गए। यह कैसी लीला है ? सेवाजी को हाथ लगाते ही यह बेहोश हो गए। पर राजा जी को जब यह खबर लगी तो उन्हें ऐसा लगा कि -- सेवाजी कोई चमत्कार कर रहे हैं। वे कोई मायाजाल जानते हैं। उन्हैं लगा सेवाजी भी कोई  जादूगर है।

यह बात सोचकर उस दुर्बुध्दी राजा को और क्रोध आ गया।

अब तो उसने एक फरमान जारी कर दिया -- जल्दी से सेवाजी को मेरे पास लाकर फांसी पर चढ़ा दिया जाए।
अब कुछ लोग भक्त सेवाजी को पकड़कर राजा के सम्मुख लेकर आए।
राजा ने सेवाजी को देख कर कहा -- बड़ी माया जानते हो, बड़ी माया चलाते हो। हमारी जेल से फाटक तोड़कर तुम घर भाग गए।
सेवाजी कहने लगे -- महाराज ! मैं कोई माया नहीं जानता हूं, ना ही मैं कोई जादूगर हूं। यह तो मेरे बंधन, मेरे परमात्मा ने खोले थे।
राजा क्रोधित होकर कहने लगा --  मैं देखता हूं, तुम्हारा परमात्मा तुम्है कैसे बचाता है।
और राजा ने पुनः एक फरमान और दे दिया -- जल्दी से दो जल्लादों को बुलाया जाए एवं अभी के अभी तलवार से इसकी गर्दन धड़ से अलग कर दी जाये।
राजा का आदेश मानकर दो जल्लाद आ गए। उनके हाथों में बड़ी तीखी तलवारें थी। वह दोनों जल्लाद हंसते हुए कहने लगे -- आज बड़े दिनों बाद हमें किसी का वध करने का अवसर प्राप्त हुआ है।
ऐसा कहकर उन्होंने भक्तजी को रस्सी से बांध दिया । अब वह दोनों जल्लाद हंसते हुए जैसे ही तलवार ऊपर उठाकर
भक्तजी पर प्रहार करने वाले थे, तभी परमात्मा की लीला से उन दोनों जल्लादों के हाथ ऊपर के ऊपर ही स्थित हो गए।
वे बड़ा प्रयास करने लगे हाथों को नीचे करने का पर उन दोनों के हाथ नीचे आ ही नहीं सके  ।
ऐसा लग रहा था जैसे कोई अच्छी मूर्ति बनी हो, उसमें प्राण रखना बाकी हो। उसी प्रकार जल्लादों की स्थिती हो गयी ।
वह शरीर से तो कायम रहे पर उनकी प्राण क्रिया बंद हो गई।हाथ ऊपर के ऊपर ही रह गए। हाथों की तलवारें अपने आप नीचे गिर गई । सब लोग देखकर हैरान हो गए ।
इन्है क्या हुआ ? यह क्या हो रहा है ? यह तो सेवाजी को मारने वाले थे।
इनके हाथों से तलवारें स्वतः छूट गईं ।
अब तो राजा ने भी विचार किया, यह कोई माया नहीं है यह तो परमात्मा की कृपा ही हो सकती है ।
ऐसा सोचकर राजा अपने सिंघासन से उठकर, सेवाजी के चरणों में आकर कहने लगा -‐ भक्तराज मुझे क्षमा करें। क्षमा करें।
भक्त सेवाजी ने राजा को उठाकर अपने हृदय से लगा लिया और कहने लगे -- राजन;  तुम्हारा अपराध नहीं है। तुम तो अपने विवेक से चलते ही नहीं हो।
तुम्हारे गुरुजी ने भी तुम्हें समझाया था कि संत सेवा किया करो पर तुम्हारी संत सेवा में रुचि नहीं है।भगवान के प्रति तुम्हारी आस्था नहीं है। इसलिए भगवान ने आज यह कृपा कर तुम्हें लीला दिखाई है।आज के बाद किसी संत को परेशान नहीं करना। संतों की सेवा करना।
वह राजा हाथ जोड़कर कहने लगा --- है भक्तराज ! मुझे क्षमा करो। आज के बाद में किसी भी संत का विरोध नहीं करूंगा।  और अपने राज्य में मंदिर का निर्माण भी कराऊंगा।
राजा की बातें सुनकर भक्तराज सेवाजी, राजा को आशीर्वाद दे अपने घर लौट आए, अब राजा मन ही मन सोचने लगा --- मैंने बिना कारण ही इन संतों से बैर किया था।
मुझे जिन लोगों ने इन संतो के विषय में भड़काया था अब तो मैं उन्हें सजा दूंगा।
राजा ने ऐसा सोचकर आदेश दिया ---  जो लोग संतों से बैर भाव रखते हैं, जिन्होंने ईर्ष्यावश सेवाजी  की शिकायत की थी, उन्हें मेरे पास पकड़ कर लाया  जाऐ।
अब राजा के सैनिक निकल गए उनकी खोज में।
जो जो लोग भक्त सेवाजी और अन्य संतो से ईर्ष्या भाव रखते थे
उन सबको पकड़ कर राजा के पास लाया गया।
राजा ने आदेश दिया --- अभी के अभी इन्हें  मृत्यु दंड दिया जाए।
अभी राजा का आदेश इस प्रकार का पास ही  हुआ था।
तभी सेवाजी पुनः राजा जी के पास लौट आए और कहने लगे --- राजन् यह क्या कर रहे हो ?
राजा कहने लगा -- है भक्तराज!  इन्होंने ईर्ष्यावश तुम्है दुख दिया है। इनके कारण ही मैंने तुम्हें जेल में बंद कर दिया था।अभी मैं इनकी लीला समाप्त किए देता हूं।
भक्तराज कहने लगे - यह अपराध करने की क्या जरूरत है? इन्हें तो परमात्मा अपने समय पर स्वतः ही दंड दे देंगे। तुम मेरी आज्ञा से इन्हें क्षमा कर दो।
जब भक्तराज ने उन उद्दण्ड  लोगों के लिए क्षमा दान मांगा।
तब वह ईर्ष्यालू लोग अपने प्राणों का दान प्राप्त कर भक्तराज के चरणों में गिर गए और कहने लगे - है भक्तराज!  हमें क्षमा कर दो । अज्ञान बस हमने आपसे भेदभाव रखा है। हमें क्षमा कर दो । तब भक्त सेवाजी कहने लगे --- इस पाप का प्रायश्चित तो तुम्हें तब ही मिल पाएगा जब तुम सच्चे हृदय से भगवान की सेवा करोगे,  संतों की सेवा करोगे।
ऐसा सुनकर वह सब कहने लगे--- है महाराज! हम आपकी आज्ञा अनुसार अपने जीवन को चलाएंगे। 
इस प्रकार अब तो सारा गांव भक्ति में बंध गया।
राजा जो कभी परमात्मा को मानता नहीं था। उसने अपने राज्य में श्री कृष्ण का मंदिर बना दिया। जो ईर्ष्यालू लोग संतो से बैर भाव रखते थे अब तो वह भी संतों की सेवा करने लगे।

              इस प्रकार देखो कितना अद्भुत होता है संतों का संग, जो उनकी शरण में आ जाए वह उनको भी संत बना देते हैं। भक्त सेवाजी जैसे महापुरुष तो अन्य साधारण लोगों को भी अपने जैसा भगवत भक्त बना देते हैं और ऐसे पावन भक्तों का मान ही तो परमात्मा रखते हैं। तभी तो भक्त सेवाजी के बंधनों को श्री कृष्ण ने तोड़ दिया। जब भक्त के ऊपर मुसीबत आयी  तो परमात्मा ने उन जल्लादों के हाथ ऊपर  ही स्तंभित कर दिये।

तो ऐसे दयालु परमात्मा जो हर समय भक्तों के सहायक बन जाते हैं ऐसे पावन श्री कृष्ण के चरणों में हम प्रणाम करते है ।

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