रामलीला करते हुए भक्त का भगवान राम मे समा जाना



                  श्रीजगन्नाथपुरी में भगवान श्रीकृष्ण के एक भक्त थे लीला अनुकरणजी। भगवान की लीलाओं के प्रति वे बड़े अनुरक्त रहते थे इसलिए उनका नाम लीलाअनुकरण हो गया था। बाल्यकाल की अवस्था की बात है, इनके शहर में लीला मंचन के लिये रामलीला की एक मंडली आई थी। रामलीला मंडली के द्वारा बड़ा ही अच्छा रामलीला का मंचन किया जा रहा था। रामलीला के मंचन में जब दशरथजी, महाराज राम के वियोग में मरने लगे, राम राम राम कहते उनके प्राण निकलने लगे उस दृश्य को देखकर यह बाल्यकाल अवस्था में बड़े भाव विभोर हो गये। इन्होंने सोचा - लगता है राम से इतना प्रेम करने पर राम की प्राप्ति हो जाती है तो मैं अवश्य ही भगवान की लीलाओं का अनुकरण करूँगा और वह भी उस रामलीला मंडली में सम्मिलित हो गए। अब जहां जहां भगवान की रासलीला होती रामलीला होती यह भी बड़े भाव से उसमें भाग लेते।
 
                   एक बार भागवत के किसी प्रसंग पर कोई लीला हो रही थी। उस लीला में इन्हें नरसिंह का अभिनय करना था। इन्हें भगवान नरसिंह बनाया गया और दृश्य के अनुरूप इन्हें नरसिंह बनकर भक्त प्रहलाद की रक्षा करनी थी और राक्षस हिरण्याकश्यप का वध करना था। 

                  अब जैसे ही पर्दा खुला, भक्त प्रहलाद ने पुकार की - हे भगवान ! आप इस खंभे से प्रकट होकर मेरी रक्षा कीजिए, मेरे पिताजी को ज्ञान दीजिए, आप सर्वत्र व्यापक हैं। 

                   जब प्रहलाद इस प्रकार रोते हुए पुकारने लगे तब लीलाअनुकरण जी जो अभिनव स्वरूप नरसिंह बने थे वह खंबे से प्रकट हो गये। उन्होंने सर्वप्रथम प्रहलाद जी को देखकर उन्हें अपने हृदय से लगा लिया। लोग तालियां बजा रहे थे, बड़ा मनोहर दृश्य था, बहुत देर तक भक्त लीला अनुकरण जी ने प्रहलाद को छोड़ा ही नहीं । तब प्रहलाद जी कहने लगे - अरे यहाँ मंचन चल रहा है बहुत लोग हमें देख रहे हैं। आपको जो अभिनय मिला है उसे पूर्ण कीजिए। अब छोटे बालक प्रहलाद की बात सुनकर वह पुनः अपने अभिनय में लौट आए, अभिनय में उन्होंने हिरण्याकश्यप के पास जाकर उसे अपनी गोदी में लिटा दिया और बड़े क्रोध में भरकर उसके पेट को अपने नाखूनों से फाड़ दिया।
 
                     करना तो अभिनय था पर यह हकीकत में घटित हो गया, सारी सभा के लोग हैरान हो गए कि यह क्या हुआ ? इस भक्त ने तो इस हिरण्याकश्यप बने अभिनयकारी का वध कर दिया है। अब बहुत से लोग इन्हें मारने के लिए दौड़े, पर क्या हो सकता था वह तो घर आ गए थे कुछ समझ ही नहीं पाए। उन्हें ऐसा प्रतीत हुआ कि इन्होंने भगवान के भक्त को कष्ट पहुंचाया है। इसलिए उन्होंने क्रोधित होकर हिरण्याकश्यप बने अभिनयकारी का वध कर दिया। सारी सभा में हाहाकार होने लगा, सब कहने लगे - यह कैसा कलाकार है इसने तो एक हत्या कर दी है।
                       भक्तजी  के खिलाफ अभियोग चलाया गया। अब कुछ लोग उनके पक्ष में थे तो कुछ लोग इनके विपक्ष में थे। अब जैसे तैसे बात कानून तक पहुंची, अदालत में सभी लोग इकट्ठे हुए। सब ने कहा यह बड़े सीधे साधे हैं, यह भावावेश में बह जाते हैं। भगवान के प्रति इनकी निष्ठा सच्ची है इन्हें माफ कर दिया जाये।
    
                       अब सबको पता था यह तो भगत इंसान है। जीवन में किसी चीज की इन्हें आवश्यकता ही नहीं। अगर जेल में बंद करें तब भी प्रसन्न रहेंगे अगर उन्हें छोड़ दिया जाएगा तब भी यह प्रसन्न रहेंगे। यही तो संतो की निशानी होती है। ऐसा सोच कर उन्हें आजाद छोड़ दिया गया। समय बीतता गया, पर कहते हैं ना जिनके मन में बदला लेने की भावना जाग्रत  हो जाती है तो वह समाप्त ही नहीं होती है।

                        अब कुछ ईर्ष्यालू लोग सोचने लगे इन्होंने एक हत्या की है उसके उपरांत भी यह कितना आजादी से घूम रहे हैं, हम इन्हें सबक सिखाएंगे। इन्होंने हमारे परिवार के सदस्य को मारा है। हम इनसे बदला अवश्य लेंगे।
अब वक्त चलता गया। एक बार किसी स्थान पर पुनः रामलीला का मंचन किया गया। अब ईर्ष्यालू लोग सोचने लगे हमने सुना है यह भगवान के बड़े भक्त हैं। और उनकी लीला करते करते यह उस लीला में इतना खो जाते हैं इन्हें शुध-बुध ही नहीं रहती।

                          जिस प्रकार यह नरसिंह बने तो इन्होंने हिरण्याकश्यप बने कलाकार को ही मार दिया। अब हम इन्हें दशरथ बनाते हैं और देखते हैं जब भगवान इन्हें छोड़कर जाएंगे तो दशरथ बनकर इनकी हालत क्या होती है। ऐसा सोचकर इन्हें दशरथ बनाया गया।
            
                      अब रामायण का कार्यक्रम प्रारंभ हुआ, रामजी का जन्म हुआ। रामजी पढ़ने के लिए आश्रम में गुरु वशिष्ट के पास गये, विश्वामित्रजी रामजी को लेने आये, सीता स्वयंवर हुआ, रामजी की विवाह के पश्चात रामजी पुनः अयोध्या में लौट आए। तभी एक दिन अचानक दशरथ जी ने विचार किया, राम को राज्य दे दिया जाए, ऐसा सोचकर उन्होंने सबसे मंत्रणा की  पर कैकई रूष्ठ हो गई। कैकई दशरथ जी के पास आकर कहने लगी - मेरे पुत्र भरत को राज दीजिए और राम को वनवास दीजिए।

            अब लीलाअनुकरण जी जो दशरथ के रूप में अभिनय कर रहे थे, वह बड़े दुखित हो गये। वह कहने लगे ‐ ऐसा नहीं हो सकता है। राम मेरा बड़ा पुत्र है उसे ही राज्य मिलेगा पर कैकई मानी नहीं और रामजी को वनवास मिला। 
                     अब लीलाअनुकरण जी बड़े दुखित हो राम लक्ष्मण सीता को वन में जाने की आज्ञा दे रहे थे। रामजी जाने को तैयार हुए। तभी अयोध्या के मंत्री श्रीसुमंतजी, श्रीराम, लक्ष्मण और सीताजी को वन की ओर लेकर जाने लगे पर जब पुनः लौटकर आये तब देखते है कि दशरथ महाराज पलंग पर मूर्छित पड़े हैं। अब वह दशरथ महाराज तो भक्त लीलाअनुकरणजी थे। वह भगवान राम को याद कर बड़े तड़पने लगे। सुमंतजी उनके पास आए, सारी सभा यह दृश्य देख रही थी। उन्होंने कभी इतना सुंदर और मनोहर दृश्य नहीं देखा था।बकि इतना भी अच्छा अभिनय कोई कलाकार कर सकता है। लोगों के लिए तो यह अभिनय था पर भक्त लीलाअनुकरण जी के लिए तो यह सच्ची विरह वेदना थी राम के वियोग की।

                     अब वह रोते हुए सुमंत से कहने लगे --  सुमंत ! राम को नहीं लेकर आए, लक्ष्मण को नहीं लेकर आए, मेरी पुत्र वधु को लेकर आ जाते मेरे प्राण बच जाते और इस प्रकार सुमंत और नजदीक आए। पर जैसे ही सुमंत नजदीक आकर भक्त जी  के शरीर पर हाथ लगाने लगे। तभी उनके शरीर में बड़ा झटका लगा। सुमंत बने कलाकार को ऐसा अनुभूत होने लगा। यह कोई साधारण कलाकार नहीं है अवश्य ही कोई दिव्य आत्मा है। अब लीला अनुकरण जी पलंग से उठकर मूर्छित हो जमीन पर गिरने लगे और जैसे ही जमीन पर गिरे तो जो लोग रामलीला देखने आए थे। वह बहुत जोर से तालियां बजाने लगे। 
             क्या तो सुंदर अभिनय किया जा रहा है। कई लोग भक्तजी का अभिनय देखकर रोने लगे। पर वह अभिनय नहीं था वह तो विरह की वेदना थी। भक्तजी फिर से कहने लगे -- सुमंत ! तुम रामजी को लेकर नहीं आए, मेरे प्राण निकल जाएंगे और ऐसा कहते कहते उनके प्राण कंठ में आ गए। 

             इसके बाद जो घटना घटित हुई वह इतना दिव्य चमत्कार था जहां लीला अनुकरण जी जमीन पर गिरे पड़े थे। अचानक से वहां पर एक प्रकाश फैल गया और वह प्रकाश इतना तेज था कि लोगों की आंखें बंद हो गई। लोग कुछ समझ ही नहीं पाए। पर जिन लोगों ने देखा उन्होंने यही अनुभूत किया कि उस प्रकाश के अंदर ही लीला अनुकरणजी की आत्मा समा गई।

              लीलाअनुकरण जी के प्राण निकल चुके थे और थोड़ी देर बाद ही वह प्रकाश भी गायब हो गया। जैसे ही वह प्रकाश गायब हुआ रामलीला के अन्य कलाकार भगते हुए भक्त जी के पास आये और देखने लगे उनके शरीर से प्राण निकल चुके थे। सब हैरान हो गए क्या हुआ। जो सुमंत बना था कलाकार वह पास में बैठ कर रो रहा था। सब पूछने लगे क्या हुआ तुमने कुछ देखा ?

वह रोते हुए कहने लगा -- मैंने तो एक ही चीज देखी।

               जब किसी को कुछ भी नहीं दिखाई दे रहा था। बड़े प्रचंड वेग से एक प्रकाश उदित हुआ। उस प्रकाश में तो मुझे सिर्फ भगवान राम ही दिखाई दिए और मुझे ऐसा प्रतीत हुआ कि इन भक्त जी की आत्मा इनके शरीर से निकलकर उनके हृदय में स्थित हो गई है। इसके बाद में कुछ भी नहीं देख सका। सब लोग बड़ा विस्मय  करने लगे कि कितने पुन्यशील भक्त थे जिनकी आत्मा को परमात्मा ने अपने हृदय में निवास दिया है। सब ने मिलकर उन भक्त की जय जयकार की सब हैरान हो गए। अगर भक्ती सच्ची हो तो परमात्मा प्रकट हो सकता है।
जिन लोगों ने ईर्ष्यावश इन्हें दशरथ बनाया था अब उनके मन में भी पश्चाताप होने लगा। वह सोचने लगे हमें पता नहीं था कि इनकी भक्ती इतनी सच्ची है पर जो भगवान के भक्त होते हैं ना उनकी कितनी भी परीक्षा ली जाए वह हरदम परमात्मा की कृपा से ही पास हो जाते हैं। 

                  आज से नहीं अनादि काल से परमात्मा अपने भक्तों को परखने आते हैं। उनकी परीक्षा लेने आते हैं और परीक्षा लेने के पश्चात उन्हें अपने निवास में स्थान दे देते हैं। यही परमात्मा की अद्भुत कृपा है। तो देखिए कितने पुन्यशील भक्त थे श्री लीलाअनुकरण जी जो भगवान की लीलाओं का श्रवण करके भगवान की लीलाओं का अनुसरण करके उनके ही पावन धाम में समा गए।
तो ऐसे भक्त और भगवान के पावन प्रसंग का श्रवण कर हम उन्हैं बारम्बार प्रणाम करते है।

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