होली का महत्व समय, तिथि, शुभ मुहूर्त || Significance Of Holi, Date & Time



होली :--

               होली हिंदू धर्म के सबसे महत्वपूर्ण पवित्र त्योहारों में से एक है । रंगों का ये त्योहार पूरे देश भर में प्रेम, हर्षोल्लास और धूमधाम से मनाया जाता है।

               पंचांगों के अनुसार हर साल फाल्गुन मास की पूर्णिमा तिथि को होली का त्योहार आता है। रंग खेलने वाले दिन को धुलेंडी  कहते हैं, जबकि उससे एक दिन पहले होलिका दहन होती है।
 
होली, रंगों के त्योहार को दो दिनों तक मनाया जाता है।

              मुख्य दिन को जलाने वाली होली के रूप में जाना जाता है - वह दिन जब होलिका दहन किया जाता है। इस दिन को छोटी होली और होलिका दहन कहा जाता है।

              दूसरे दिन को रंगवाली होली के रूप में जाना जाता है - वह दिन जब व्यक्ति रंग बिरंगे पाउडर और रंग बिरंगे पानी के साथ खेलते हैं। रंगवाली होली, जो एक प्राथमिक अवकाश होता है, अन्यथा इसे धुलंडी कहा जाता है। धुलंडी के वैकल्पिक रूप से कम प्रसिद्ध बोलने के लिए शब्द धुलेटी, धूलि पाडवा हैं।

               इस साल होली का त्योहार 29 मार्च को है, जबकि 28 को होलिका दहन होगा। होली की तिथि 28-29 मार्च, सप्ताह के क्रमशः रविवार और सोमवार को है। हिन्दू पंचांग के अनुसार, होली फाल्गुन पूर्णिमा के दिन मनाई जाती है। 

               बुराई पर अच्छाई की जीत के रूप में इस पर्व को मनाया जाता है। इसी दिन से चैत्र कृष्ण पक्ष की शुरुआत भी हो जाती है। आइए जानते हैं इससे जुड़ी अन्य बातें – 

होली शुभ मुहूर्त :--


होलिका दहन की तिथि --  रविवार,  28 मार्च, 2021 

समय        :---   18:37 से 20:56 शाम 

अवधि      :---   02 घंटे 20 मिनट 

धुलंडी उत्सव की तिथि --  29 मार्च, 2021 है। 

पूर्णिमा तिथि शुरू     :    28 मार्च 2021, रविवार सुबह 03:27 मिनट से

पूर्णिमा तिथि समाप्त :    29 मार्च 2021, सोमवार रात  00:17 मिनट तक

भद्रा पूंछ  :  29 मार्च 2021 सुबह 10:13 मिनट से सुबह 11:16 मिनट तक

भद्रा मुख : 29 मार्च 2021  सुबह 11:16 मिनट से दोपहर 01:00 बजे तक

कब है होलाष्टक :--


               वर्ष 2021 में 22 मार्च 2021 से 28 मार्च, 2021 के मध्य तक होलाष्टक का समय माना गया है। मुख्य रुप से पंजाब और उत्तरी भारत में ये 8 दिन महत्वपूर्ण होते हैं।

               ज्योतिष शास्त्र में होलाष्टक को शुभ नहीं माना जाता है। इसलिए होली से 8 दिन पहले शुभ कार्यों को करना वर्जित होता है। इन 8 दिनों में शादी, गृह प्रवेश जैसे शुभ कार्य नहीं किये जाते हैं। इसे होली के आने की सूचना भी कहा जाता है, यही कारण है कि होली को कुल 9 दिनों का त्योहार माना जाता है।

होली कैसे मनाई जाती है?


              होली प्राय: होलिका दहन के बाद, धुलंडी के दिन मनायी जाती है। अलग-अलग रंग के गुलाल और अबीर से भरी हुई होती है। आकाश होली के रंगों से भरा दिखता है और हर जगह केवल "होली है" की आवाजें आती है। युवक ढोल बाजे और डीजे की थाप पर नाचते हैं और गावों मे फग्वा खेलकर घरों घर जाकर ढोल और झांझर के साथ गीत गाते हैं, और रंग गुलाल लगाते हैं, ओर बड़े-बुजुर्गों के पैर छूकर उनसे आशीर्वाद प्राप्त करते हैं।

               होली के अवसर पर गुझिया, मठरी, बेशन पपड़ी और लड्डूओं के पकवान बनाये जाते हैं और खाये जाते हैं। भांग का उपयोग होली की मस्ती को बढ़ाने के लिए किया जाता है। कुछ भागों में, होली विशेष विषयों को रखकर बड़े होली कार्यक्रम, पंडाल या होली पार्टियों का आयोजन किया जाता है। 

जानिए होलीका दहन से जुड़ी विष्णुजी की पौराणिक कथा :---  


               होली भगवान विष्णुजी और उनके परम भक्त प्रह्लाद के सम्मान में बुराई पर अच्छाई की विजय के त्योहार के रूप में मनायी जाती है।

               भागवत पुराण के अध्याय 7 में एक पौराणिक कथा के अनुसार, जब राजा हिरण्यकश्यप राक्षसी असुरों के राजा थे। उसने भगवान ब्रह्मा की पूजा की और कठिन तपस्या की। उनकी दृढ़ प्रार्थना के फल के रूप में, भगवान ब्रह्मा ने उन्हें एक वरदान दिया था, जिसमें उन्हें पांच विशेष शक्तियां  प्रदान की थी जो इस प्रकार थीं -

    उन्हें न तो कोई इंसान मार सकता था, न ही कोई जानवर, 
    न तो घर के अंदर मार सकता था और न ही बाहर, 
    न तो दिन में मार सकता था  और न ही रात में, 
    न तो प्रक्षेप्य हथियार से और न ही किसी शास्त्र (हाथ में हथियार) द्वारा,
   और न ही जमीन पर और न ही पानी या हवा में उनको कोई मार सकता था। 

               हिरण्यकश्यप को ऐसा वरदान प्राप्त होने से वह घमंडी हो गया और पूरी पृथ्वी पर अपना शासन चलाना चाहता था, और अपने आप को वह भगवान भी समझने लगा था, और वह चाहता था की पूरी प्रजा केवल उसकी ही पूजा करें।



               हिरण्यकश्यप का अपना पुत्र प्रह्लाद अपने पिता की बात से असहमत था। और वह भगवान विष्णुजी का अनन्य भक्त था। उसकी भगवान विष्णु के प्रति इतनी भक्ती से हिरण्यकश्यप बहुत क्रोधित हुआ। उसने अपने पुत्र प्रह्लाद को क्रूर दंड देना चाहा। उसे रोकने के लिए हिरण्यकश्यप ने कई प्रयास किए लेकिन आखिर में, राक्षस राजा ने अपनी बहन होलिका की मदद से उसका वध करने का षड़यंत्र रचा, होलिका को आग में नहीं जलने का एक वरदान मिला था। उसने उसे अपनी बहन और प्रह्लाद की दुष्ट बुआ होलिका के साथ एक चिता पर बैठा दिया। होलिका ने आग से बचने के लिये एक लबादा पहना हुआ था जिससे वह आग में जलने से बच सकती थी, जबकि प्रह्लाद को आग मे जलाकर मारना चाहता था।

               अब जैसे ही आग भड़की, लबादा होलिका से उड़ गई और प्रह्लाद को घेर लिया, इससे  प्रह्लाद  तो बच गया लेकिन होलिका आग में जल कर मर गयी।

               अपने भक्त को इस तरह सताये जाने से भगवान विष्णुजी बहुत दुखी और नाराज हुए। उन्होने अपने भक्त प्रहलाद को बचाने और राक्षसी  राजा हिरण्यकश्यप का वध कर धर्म को बचाने के लिए अवतार के रूप में नरसिंह का रूप धारण कर अवतार लिया – जो आधे मानव और आधे शेर ( जो न तो मनुष्य है और न ही जानवर ) के रूप में थे।


              और उन्होने हिरण्याकश्यप को, शाम को ( जब वह दिन या रात नहीं था ), एक दरवाजे पर ले जाकर ( जो न तो घर के अंदर था और न ही बाहर ), उसे अपनी गोद में रखकर ( जो न तो भूमि, जल और न ही हवा थी ), उस दुष्ट राजा को अपने पंजे से ( जो न तो अस्त्र था और ना ही शस्त्र से ) चीरकर मार डाला जिससे  उसका राक्षसी राज्य समाप्त हुआ और पुन: धर्म की स्थापना हुई।

              इस प्रकार होली, होलिका दहन के रूप में बुराई पर अच्छाई की जीत के रूप में मनाया जाता है। और होली की प्रतीकात्मक जीत, हिरण्यकश्यप पर प्रह्लाद की जीत और होलिका को जलाने का प्रतीक है।

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