आमलकी एकादशी / Know all about Amalki Ekadashi Date, Auspicious Time.




               पांचांगों  के अनुसार फाल्गुन माह के कृष्ण शुक्ल पक्ष की आने वाली एकादशी को आमलकी एकादशी कहते हैं। इसे आंवला/ आमलक्य/आमलका एकादशी भी कहा जाता है।
  • इस बार ये 25 मार्च 2021 दिन गुरुवार को पड़ रही है। 

               धार्मिक मान्यता के अनुसार आमलकी का मतलब आंवला होता है, जिसे हिन्दू धर्म और आयुर्वेद दोनों में श्रेष्ठ बताया गया है। पद्म पुराण के अनुसार आंवले का वृक्ष भगवान विष्णु को अत्यंत प्रिय होता है। मान्यता के अनुसार आंवले के वृक्ष में श्री हरि और लक्ष्मी जी का वास होता है। 

               आंवले के वृक्ष में भगवान विष्णु का वास होने की वजह से उसी के नीचे भगवान का पूजन किया जाता है, यही आमलकी एकादशी कहलाती है। इस दिन आंवले का उबटन, आंवले के जल से स्नान, आंवला पूजन, आंवले का भोजन और आंवले का दान करना चाहिए।
आमलकी एकादशी के दिन भगवान विष्णु की विधि-विधान से पूजा कर प्रसन्न किया जाता है। 

इस दिन है आंवले के पेड़ की पूजा :--


               इस एकादशी के दिन भगवान विष्‍णु के साथ आंवले के वृक्ष की पूजा की जाती है। हिंदू धर्म में पीपल और आंवले के वृक्ष को देवता के समान माना जाता है। मान्‍यता है कि जब भगवान श्री हरि विष्णु ने सृष्टि की रचना के लिए ब्रह्मा जी को जन्म दिया, उसी समय भगवान विष्णु ने आंवले के वृक्ष को भी जन्म दिया। इसी कारण आंवले के वृक्ष की पूजा की जाती है। आंवले के वृक्ष के हर अंग में ईश्वर का निवास माना जाता है।

एकादशी तिथि व्रत पारणा शुभ मुहूर्त :--


एकादशी तिथि आरंभ --- 24 मार्च 2021 दिन बुधवार सुबह 10:32 मिनट से 

एकादशी तिथि समाप्त- 25 मार्च 2021 दिन बृहस्पतिवार सुबह 09:47 मिनट पर 

द्वादशी तिथि पारणा मुहूर्त- 26 मार्च दिन शुक्रवार सुबह 06:53 मिनट से 08:12 मिनट तक।  

पारणा अवधि- 02 घंटे 27 मिनट रहेगी।

आमलकी एकादशी महत्व :--


             पद्म पुराण के अनुसार, आमलकी एकादशी का व्रत पूरे नियमों का पालन कर निष्ठा के साथ करना चाहिए। इस एकादशी के दिन आंवले के वृक्ष के नीचे बैठकर भगवान विष्णु का पूजन करना चाहिए। मान्यता है कि इस व्रत को रखने से सौ गायों को दान करने के बराबर और सैंकड़ों तीर्थों के दर्शन के समान पुण्य फल मिलता है। जो लोग इस व्रत को नहीं करते हैं वह इस दिन भगवान विष्णु को आंवला अर्पित करें और स्वयं इसे ग्रहण भी करें। ऐसा करने से व्यक्ति को समृद्धि की प्राप्ति होती है। इस दिन पूजा के बाद विष्णु सहस्रनाम का पाठ अवश्य करना चाहिए। 

आमलकी एकादशी व्रत की पूजा विधि :--


               आमलकी एकादशी में आंवले का विशेष महत्व है। इस दिन पूजन से लेकर भोजन तक हर कार्य में आंवले का उपयोग होता है। आमलकी एकादशी की पूजा विधि इस प्रकार है। 

1. आमलकी एकादशी के दिन प्रात: काल उठकर स्नान करके भगवान विष्णु की प्रतिमा के समक्ष हाथ में तिल, कुश, मुद्रा और जल लेकर व्रत का संकल्प करें।

2. संकल्प करें कि मैं भगवान विष्णु की प्रसन्नता एवं मोक्ष की कामना से आमलकी एकादशी का व्रत रखता हूं। मेरा यह व्रत सफलतापूर्वक पूरा हो इसके लिए श्रीहरि मुझे अपनी शरण में रखें।

3. उसके बाद  षोड्षोपचार सहित भगवान की पूजा करें।

4.  भगवान की पूजा के पश्चात पूजन सामग्री लेकर आंवले के वृक्ष की पूजा करने के लिये जायें।

5. सबसे पहले वृक्ष के चारों ओर की भूमि को साफ करें और उसे गाय के गोबर से पवित्र करें।

6. पेड़ की जड़ में एक वेदी बनाकर उस पर कलश स्थापित करें। इस कलश में देवताओं, तीर्थों एवं सागर को आमंत्रित करें।

7. कलश में सुगंधी और पंच रत्न रखें। इसके ऊपर पंच पल्लव रखें फिर दीप जलाकर रखें। कलश पर श्रीखंड चंदन का लेप करें और वस्त्र पहनाएं।  

8.अंत में कलश के ऊपर श्री विष्णु की मूर्ति स्थापित करें और विधिवत रूप से पूजा करें।  

9.पूजा संपन्न करने के पश्चात विष्णु सहस्रनाम का पाठ करें।

10. रात्रि में भगवत कथा व भजन-कीर्तन करते हुए प्रभु का स्मरण करें। 

11.  द्वादशी के दिन सुबह ब्राह्मण को भोजन करवा कर दक्षिणा दें साथ ही  मूर्तिसहित कलश ब्राह्मण को भेंट करें। इन क्रियाओं के पश्चात परायण करके अन्न जल ग्रहण करें। 

आमलकी एकादशी मंत्र :---

 
'मम कायिकवाचिकमानसिक,  सांसर्गिकपातकोपपातकदुरित,
क्षयपूर्वक श्रुतिस्मृतिपुराणोक्त  फल प्राप्तयै श्री परमेश्वरप्रीति 
कामनायै आमलकी  एकादशी व्रतमहं करिष्ये'।

आमलकी एकादशी व्रत कथा :--


               पौराणिक कथा के अनुसार, जब इस सृष्टि का सृजन हुआ तब ब्रह्मा जी भगवान विष्णु की नाभि से उत्पन्न हुए। उनके मन में यह जानने की जिज्ञासा हुई कि वे कौन हैं और उनकी उत्पत्ति कैसे हुई है। इसका जवाब जानने के लिए वे भगवान विष्णु की तपस्या में लीन हो गए। उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान विष्णु ने उनको तपदर्शन दिए।

               इससे ब्रह्मा जी भावुक हो गए और उनकी आंखों से आंसू निकल पड़े। वे आंसू उनके चरणों पर गिरे और उससे आंवले का पेड़ उत्पन्न हो गया। ब्रह्मा जी की तपस्या से प्रसन्न होकर विष्णु जी ने कहा कि आपके आंसुओं से उत्पन्न यह पेड़ और इसके फल मुझे अत्यंत प्रिय होंगे। भगवान विष्णु ने कहा कि आज से जो भी व्यक्ति आमलकी एकादशी का व्रत रखेगा और आंवले के पेड़ की विधिपूर्वक पूजन करेगा, उसके सभी पाप नष्ट हो जाएंगे और उसके मोक्ष की प्राप्ति होगी। 

आमलकी एकादशी की एक अन्य कथा :--


               प्राचीन काल में चित्रसेन नामक राजा राज्य करता था। उसके राज्य में एकादशी व्रत का बहुत महत्व था और सभी प्रजाजन एकादशी का व्रत करते थे। वहीं राजा की आमलकी एकादशी के प्रति बहुत श्रद्धा थी। एक दिन राजा शिकार करते हुए जंगल में बहुत दूर निकल गये। तभी कुछ जंगली और पहाड़ी डाकुओं ने राजा को घेर लिया। इसके बाद डाकुओं ने शस्त्रों से राजा पर हमला कर दिया। मगर देव कृपा से राजा पर जो भी शस्त्र चलाए जाते वो पुष्प में बदल जाते। 

               डाकुओं की संख्या अधिक होने से राजा संज्ञाहीन होकर धरती पर गिर गए। तभी राजा के शरीर से एक दिव्य शक्ति प्रकट हुई और समस्त राक्षसों को मारकर अदृश्य हो गई। जब राजा की चेतना लौटी तो, उसने सभी राक्षसों का मरा हुआ पाया। यह देख राजा को आश्चर्य हुआ कि इन डाकुओं को किसने मारा? तभी आकाशवाणी हुई- हे राजन! यह सब राक्षस तुम्हारे आमलकी एकादशी का व्रत करने के प्रभाव से मारे गए हैं। तुम्हारी देह से उत्पन्न आमलकी एकादशी की वैष्णवी शक्ति ने इनका संहार किया है। इन्हें मारकर वहां पुन: तुम्हारे शरीर में प्रवेश कर गई। यह सुनकर राजा प्रसन्न हुआ और वापस लौटकर राज्य में सबको एकादशी का महत्व बतलाया।

Post a Comment

Please do not enter any spam link in the comment box.

Previous PostNext Post