हनुमान जी से जुडी कुछ ऐसी बातें जो आपने पहले कभी नहीं सुनी होंगी || Some interesting fact that you never heard about Hanuman Ji 


Hanuman Ji


जानिए हनुमान जी का जन्म कब हुआ :--


Birth Of Hanuman

               ज्योतिषीयों के सटीक गणना के अनुसार हनुमान जी का जन्म 58 हजार 112 वर्ष पहले तथा लोकमान्यता के अनुसार त्रेतायुग के अंतिम चरण में चैत्र पूर्णिमा को मंगलवार के दिन चित्रा नक्षत्र व मेष लग्न के योग में सुबह 6.03 बजे भारत देश में झारखंड राज्य के गुमला जिले के आंजन नाम के छोटे से पहाड़ी गाँव की एक गुफा में हुआ था।

क्यों हनुमानजी ने माता सीता द्वारा दिए गए उपहार को लेने से मना कर दिया :--


Gift given to Hanuman By Sitaji

               भगवान रामजी  के राज्याभिषेक के बाद माता सीता ने सभी लोगों को उपहार दिउए थे। इसी क्रम में उन्होंने हनुमानजी को भी एक खूबसूरत मोती का हार उपहार स्वरूप प्रदान किया था। जब हनुमान जी को हार प्राप्त हुआ तो हनुमानजी ने उस हार के हरेक मोती को तोड़कर उसमें भगवान राम की छवि खोजा। लेकिन जब उन्हें उस हार में भगवान राम के दर्शन नहीं हुए तो उन्होंने उस हार को अस्वीकार करते हुए कहा कि जिस वस्तु में भगवान राम की छवि न हो वह मुझे अस्वीकार्य है और उस हार को वापस कर दिया। इसके बाद उन्होंने अपनी छाती फाड़कर लोगों को दिखाया कि उनके सीने में भगवान राम बसते हैं।

क्यों भगवान राम ने हनुमानजी को मौत की सजा सुनायी :--  


Why lord Ram given death Punishment to Hanuman

               एक बार नारदजी के कहने पर हनुमानजी ने विश्वामित्र को छोड़कर सभी संतों का स्वागत किया, क्योंकि विश्वामित्र भी किसी समय एक बार राजा थे। इस बात से विश्वामित्र काफी नाराज हुए और उन्होंने भगवान राम से हनुमानजी को मृत्युदंड देने के लिए कहा। चूंकि विश्वामित्र भगवान राम के गुरू थे अतः वे उनके आदेश को टाल नहीं सके और गुरु के आदेशानुसार हनुमानजी पर वाणों की बौछार कर दी। अपने तरफ वाणों को आता देखकर हनुमानजी राम नाम का जाप करने लगे, जिसके कारण सभी वाण वहीं रुक कर हनुमान जी को प्रणाम कर वापस लौट गए। यह देखकर भगवान राम ने ब्रह्मास्त्र का प्रयोग किया, लेकिन ब्रह्मास्त्र भी ध्यानमग्न हनुमानजी की प्रदक्षिणा कर वापस लौट गया। यह देखकर भगवान राम ने हनुमानजी को मृत्युदंड का विचार त्याग दिया।

पवनपुत्र हनुमान भगवान शिव के अवतार थे :--


Lord shiv another birth as hanuman

               एक बार स्वर्ग में रहने वाली अप्सरा “अंजनी” को एक ऋषि ने शाप दिया था कि जब वह किसी से प्रेम करेगी तो उसका चेहरा बंदर के समान हो जाएगा। ऐसा श्राप सुनकर उनको बहुत पछ्तावा हुआ। अतः उन्होंने भगवान ब्रह्मा जी से मदद के लिए गुहार लगाई। भगवान ब्रह्मा की कृपा से उन्होंने पृथ्वी पर मानव के रूप में जन्म लिया। बाद में अंजनी वानरों के राजा केसरी के साथ प्रेम करने लगी और दोनों ने शादी कर ली। अंजनी भगवान शिव की परम भक्त थी और उनकी भक्ति से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने उनके पुत्र के रूप में जन्म लेने का वरदान दिया। 

               कुछ दिन बाद जब राजा दशरथ पुत्रोष्टि यज्ञ कर रहे थे, जिसके बाद ऋषि ने उन्हें अपनी सभी पत्नियों को खिलाने के लिए खीर दिया। रानी कौशल्या के हिस्से की कुछ खीर एक चील लेकर भाग गया। वह चील जब खीर लेकर उड़ रहा था तो भगवान शिव के संकेत पर वायु देव ने उस खीर के कुछ हिस्से को ध्यान कर रही अंजना के हाथों पर गिरा दिया। अंजना ने इसे भगवान शिव का प्रसाद समझकर खा लिया, जिसके परिणाम स्वरूप माता अंजनी ने पवनपुत्र हनुमान को जन्म दिया, जो भगवान शिव के अवतार हैं।

ब्रह्मचारी होने के बावजूद हनुमानजी कैसे एक पुत्र के पिता हुए :--


Son Of Hanuman

               आपको यह जानकर आश्चर्य होगा कि ब्रह्मचारी होने के बावजूद हनुमानजी एक पुत्र के पिता थे। हनुमानजी के पुत्र का नाम “मकरध्वज” था और उसका जन्म एक मछली के पेट से हुआ था। जब हनुमानजी ने पूरे लंका को जलाने के बाद अपनी पूंछ और अपने शरीर को ठंडा करने के लिए समुद्र में डुबकी लगाई तो उनके शरीर से निकले पसीने को एक मछली निगल गई। बाद में उसी मछली के परत से मकरध्वज का जन्म हुआ। जो की हनुमान जी का पुत्र कहलाया।

कौन थे हनुमानजी के पांच सगे भाई :--

 
               आपको जानकर आश्चर्य होगा कि हनुमानजी के पांच सगे भाई भी थे और वह पांचों ही विवाहित थे। इस बात का उल्लेख “ब्रह्मांडपुराण” में मिलता हैl इस पुराण में भगवान हनुमान के पिता केसरी एवं उनके वंश का वर्णन शामिल है। इस पुराण में वर्णित है वानर राज केसरी के 6 पुत्र थे, जिनमें सबसे बड़े पुत्र “हनुमानजी” थे। हनुमानजी के भाईयों के नाम क्रमशः मतिमान, श्रुतिमान, केतुमान, गतिमान और धृतिमान था और इन सभी की संतान भी थीं, जिससे इनका वंश कई वर्षों तक चला।

जब हनुमान जी ने सूर्य को फल समझकर पकड़ा :--


Hanuman Take sun As a Fruit

               हनुमानजी के जन्म के पश्चात् जब वे बाल्य अवस्था में थे तब एक दिन इनकी माता अंजनी फल लाने के लिये इन्हें आश्रम में छोड़कर चली गईं। जब बाल्यरूप हनुमानजी को भूख लगी तो वे उगते हुये सूर्य को फल समझकर उसे पकड़ने आकाश में उड़ने लगे। उनकी सहायता के लिये पवनदेव भी बहुत तेजी से चलने लगे। उधर भगवान सूर्य ने भी उन्हें अबोध बालक समझकर अपने तेज को कम कर लिया ताकी वो जले नहीं। जिस समय हनुमान सूर्य को पकड़ने के लिये सुर्य के नजदीक गये, उसी समय राहु सूर्य पर ग्रहण लगाना चाहता था। हनुमानजी ने सूर्य के ऊपरी भाग में जब राहु का स्पर्श किया तो वह भयभीत होकर वहाँ से भाग गया। उसने इन्द्र के पास जाकर शिकायत की "देवराज! आपने मुझे अपनी क्षुधा शान्त करने के साधन के रूप में सूर्य और चन्द्र दिये थे। आज अमावस्या के दिन जब मैं सूर्य को ग्रस्त करने गया तब देखा कि दूसरा राहु सूर्य को पकड़ने जा रहा है।" 

               राहु की यह बात सुनकर इन्द्र घबरा गये और उसे साथ लेकर सूर्य की ओर चल पड़े। राहु को देखकर हनुमानजी सूर्य को छोड़ राहु पर झपटे। राहु ने इन्द्र को रक्षा के लिये पुकारा तो उन्होंने हनुमानजी पर वज्रायुध से प्रहार कर दिया जिससे वे एक पर्वत पर गिरे और उनकी बायीं ठुड्डी टूट गई। हनुमान की यह दशा देखकर वायुदेव को क्रोध आया। उन्होंने उसी क्षण अपनी हवा की गति रोक दी। इससे संसार का कोई भी प्राणी साँस न ले सका और सब पीड़ा से तड़पने लगे। तब सारे सुर, असुर, यक्ष, किन्नर आदि ब्रह्मा जी की शरण में गये। ब्रह्मा जी उन सबको लेकर वायुदेव के पास गये। वे  मूर्छीत हनुमानजी को गोद में लिये उदास बैठे थे। जब ब्रह्माजी ने उन्हें जीवित किया तो वायुदेव ने अपनी गति का संचार करके सभी प्राणियों की पीड़ा दूर की। फिर ब्रह्माजी ने कहा कि कोई भी शस्त्र इसके अंग को हानि नहीं कर सकता। इन्द्र ने कहा कि इसका शरीर वज्र से भी कठोर होगा। सूर्यदेव ने कहा कि वे उसे अपने तेज का शतांश प्रदान करेंगे तथा शास्त्र मर्मज्ञ होने का भी आशीर्वाद दिया। वरुण ने कहा मेरे जल से यह बालक सदा सुरक्षित रहेगा। यमदेव ने अवध्य और नीरोग रहने का आशीर्वाद दिया यक्षराज कुबेर, विश्वकर्मा आदि देवों ने भी अमोघ वरदान दिये।

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