इस पापमोचनी एकादशी का व्रत करके  पायें अपने समस्त पापों से निवारण, Know All about Papmochani Ekadashi 2021



पापमोचनी एकादशी क्या है :--


               शाब्दिक अर्थ में, पापमोचनी शब्द दो शब्दों से मिलकर बना है। जहां 'पाप' का अर्थ  'अपराध' और  'मोचनी’  का अर्थ ‘निष्कासन या निष्काषित' करना है। इससे  यह संकेत मिलता है कि जो कोई भक्त पापमोचनी एकादशी का पालन करता है वह सभी अतीत और वर्तमान के पापों से मुक्त हो जाता है। पापमोचनी एकादशी के इस शुभ और सौभाग्यशाली दिन पर, भगवान विष्णुजी की पूजा अर्चना की जाती है। 

कब है पपमोचनी एकादशी :--


पापमोचनी एकादशी चैत्र माह की कृष्ण पक्ष के 11वें दिन होती है। 
वर्ष 2021 में पापमोचनी एकादशी व्रत 7 अप्रैल, दिन- बुधवार को है।

पापमोचनी एकादशी व्रत का महत्व :--


               पापमोचनी एकादशी समस्त पापों  का अंत करने वाली एकादशी होती है। पापमोचनी एकादशी के दिन पूरे विधि-विधान के साथ भगवान विष्णु जी की पूजा की जाती है। पापमोचनी एकादशी के उपवास को करने से उपासक को ब्रह्महत्या, अहिंसा, मदिरापान, स्वर्ण चोरी और भ्रूणघात समेत कई संगीन पापों के दोष से मुक्ति मिलती है। इस दिन झूठ बोलने से बचना चाहिए और किसी की निंदा नहीं करनी चाहिए।

पापमोचनी एकादशी व्रत 2021 मुहूर्त :--


पापमोचनी एकादशी :     07 अप्रैल, 2021 दिन -- बुधवार
पारणा मुहूर्त             :     8 अप्रैल, समय 13:39 से 16:11 तक,
अवधि                      :     2 घंटे 32 मिनट 
हरिवासर समाप्त      :     08 अप्रेल, सुबह 08:42 पर  

पापमोचनी एकादशी व्रत पूजा विधि :--


समस्त पापों को नष्ट करने वाली पापमोचनी एकादशी व्रत की पूजा इस प्रकार करें।
 
1.  सर्वप्रथम व्रती को एकादशी के दिन प्रात:काल उठकर नित्यप्रति क्रिया से निवृत होकर स्नान करना चाहिए। 
2.  स्नान के बाद भगवान विष्णुजी के समक्ष निराहार व्रत का संकल्प करें।
3.  इसके बाद भगवान विष्णु की षोडशोपचार विधि से पूजा करें और भगवानजी को धूप, दीप, चंदन और फल             आदि अर्पित करके आरती करें।
4.  भिक्षुकों, जरुरतमंद व्यक्ति व ब्राह्मणों को दान और भोजन करायें।
5.  रात्रि में विष्णु सहस्त्रनाम का जाप करें ओर रात्री जागरण करते हुए भगवान का भजन कीर्तन करें।
6.  द्वादशी के दिन प्रात: स्नान करके विष्णु भगवान की पूजा करें फिर पारण के बाद व्रत खोलें ब्रह्मणों को भोजन         करवाकर दक्षिणा सहित विदा करें पश्चात स्वयं भोजन ग्रहण करें।

पापमोचनी एकादशी व्रत कथा :--


               चित्ररथ नामक वन में मेधावी नाम के एक ऋषि रहते थे जो भगवान शिव के अनन्य भक्त थे। वे हमेशा तपस्या में लीन रहते थे और चित्ररथ वन में कड़ी साधना करते थे। उसी वन में भगवान इंद्र अपनी कई अप्सराओं के साथ  भ्रमण, विहार करने आया करते थे क्योंकि वह वन अति रमणीय पशु, पक्षियों और सुंदर फूलों  से भरा था। एक बार ऋषि मेधावी को देखकर, भगवान इंद्र ने सोचा कि अगर यह ऋषी इस तरह से अपनी तपस्या जारी रखते हैं तो उन्हें स्वर्ग में उच्च स्थान मिल सकता है और मेरी जगह छिन सक्ती है। इसलिए उन्होंने मेधावी को अपने ध्यान से विचलित करने के लिए एक उपाय किया। उन्होने सभी अप्सराओं में से मंजूघोषा नाम की एक अप्सरा को  ऋषि का ध्यान हटाने के लिए लगा दिया। उस अप्सरा ने ऋषी का ध्यान हटाने के बहुत सारे प्रयास किये लेकिन उनकी तपस्या की परम शक्ति के कारण, उसके सभी प्रयास विफल हो गए। इस तरह अपने प्रयास विफल होने पर मंजूघोषा ने एक धर्मोपदेश स्थापित किया और मेधावी के आश्रम से कुछ मील दूर रहने लगी और मधुर स्वर में गाने लगी। उसको इतनी खूबसूरती से गाना गाते हुए देख कर, भगवान कामदेव काफी प्रभावित हुए और इस तरह अपनी जादुई और शक्तिशाली धनुष के साथ, उन्होंने प्रेम के तीर का निशाना लगा कर मेधावी का ध्यान मंजूघोषा की ओर आकर्षित किया। इस वजह से, मेधावी अपना सारा ध्यान खो बैठे और मंजूघोषा के आकर्षण और सुंदरता के साथ प्रेम में पड़ गए।

               वह खुद को पूरी तरह से भूल गए और अपनी आत्मा की पवित्रता को भी खो दिया। मेधावी के साथ लंबा समय बिताने के बाद, मंजूघोषा ने अपनी रुचि खो दी और खुद को ऋषि से मुक्त करना चाहा। जब उसने उन्हें छोड़ने की अनुमति देने के लिए कहा, तो मेधावी ने महसूस किया कि उसे गुमराह किया गया और धोखा दिया गया था और उसी के कारण वह अपने जीवन के कठिन साधना और तपस्या से विचलित हो गए थे। गुस्से में, उन्होंने मंजूघोषा को एक बदसूरत और भयानक चुड़ैल में बदलने का शाप दे दिया।

               बाद में मेधावी अपने पिता ऋषि च्यवन के आश्रम गए। तब ऋषि ने मेधावी को पापों को मिटाने के लिए पापमोचनी एकादशी का व्रत करने के लिए मार्गदर्शन किया। मेधावी के साथ-साथ मंजूघोषा ने भी अपने किए पर पछतावा किया और इस तरह भगवान विष्णु को समर्पित व्रत मनाया। परिणामस्वरूप, वे अपने पापों से मुक्त हो गए, लेकिन उनकी महान भक्ति और तपस्या के कारण, भगवान इंद्र अपने उद्देश्य में सफल नहीं हो सके।

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