भगवान ने अपने भक्त की कन्या का विवाह होने से रोका || Lord Shiva stopped the marriage of his devotee's daughter.
Lord Shiva

            यह एक सत्य घटना है जो की सन् 2010 के आसपास की है। एक परिवार मे पिता की बेटी विवाह के योग्य हुई। परिवार वालों को उस बेटी के विवाह के लिए बहुत प्रस्ताव मिल रहे थे। जिन्हें  परिवार वाले कुछ वजहों से कुछ प्रस्ताव को नामंजूर कर देते थे और कभी कभी कई लोग उन्हैं स्वीकार नहीं करते थे। इस प्रकार धीरे-धीरे समय व्यतीत होता जा रहा था।
            एक दिन उदास होते हुए पिताजी ने अपनी बेटी से कहा -- बेटी ! कहीं तो हां करलो। इतने सारे प्रस्तावों में तुम्हें कोई भी पसंद नहीं आ रहा है ?

अब बेटी तो भगवान भोलेनाथ की भक्त थी, उन्हैं ही मानती, पूजती थीं और उन पर बहुत विश्वास करती थी। सब कुछ भगवान पर ही छोड़ रखा था।

तो बेटी ने कहा -- पिताजी क्यों चिंता करते हो। भगवान भोलेनाथ बैठे हैं ना, वो जहाँ चाहेंगे वहा करा देंगे। बेटी का तो भगवान भोलेनाथ में अटूट विश्वास था। सब कुछ वो ही सम्भालेंगे, बेटी की ऐसी बातें सुनकर पिताजी कहने लगे पर भगवानजी कब भला करेंगे तुम्हारा, कितना समय निकलता जा रहा है ? तुम्हारी सारी उम्र अब बड़ी और ज्यादा होती जा रही है। अब तो अपने परमात्मा से कहो कि वह तुम्हारा विवाह जल्दी करा दें। तब वह हंसकर कहने लगी - अरे सब उनके हाथ में है। जिस दिन कराना चाहेंगे उस दिन करा देंगे। पिताजी! आप चिंता नहीं किया करो। 
            रात्रि में अपनी बेटी की यह बात सुनकर वह सोने चला गया। दूसरे दिन जब वे अपनी दुकान पर गये तब एक बिचौलिया, जो विवाह के संबंध कराता था। वह उनके पास आकर कहने लगा -- अरे श्रीमान जी !! उदास क्यों होते हो ? मैं तुम्हारी बेटी के लिए एक अच्छा प्रस्ताव लेकर आया हूँ।

            तुम्हारे पड़ोस में ही एक अच्छा संपन्न परिवार रहता है। बढ़ियां परिवार है, अच्छे लोग हैं। उनका लड़का भी बड़ा सुंदर और सुशील है, उसके साथ तुम अपनी बेटी का विवाह करा सकते हो। उसकी बातें सुनकर लड़की के पिताजी प्रसन्न हो गये। श्रीमान जी ने  उस लड़के की जन्मकुंडली अपने हाथ में ली और रात्रि के समय घर आ गये। घर आकर अपनी धर्म पत्नी से कहा -- आज मुझे अपनी बेटी के लिए अच्छा प्रस्ताव आया है और मुझे तो वह स्वीकार है, एक बार तुम भी देख लो।

            धर्मपत्नी ने लड़के वालों का नाम सुना तो उसने बिना कुछ सोचे ही हाँ कर दी। प्रातः काल हुआ, पिताजी ने अपनी बेटी से कहा -- तुम्हारे लिए एक बड़ा योग्य रिश्ता आया है, हमारा तो विचार है शादी का और हमने तो हाँ भी कर दी है, अब तुम्हें भी हां करनी है। बेटी कहने लगी कि सब भोलेनाथ के ऊपर है, जैसा उन्हें मेरे लिये अच्छा लगेगा वह वैसा ही करेंगे। अब पिताजी सोचने लगे कि बेटी ने तो हां कर दी है, बेटी ने पुनः कहा -- सब भोलेनाथ जी के हाथ में है, जैसा उन्है मेरे लिए अच्छा लगेगा,  वह वैसा ही करेंगे।

            अपनी बेटी की यह बात सुनकर श्रीमान जी दुकान आ गये। दुकान पर आकर,  उन्होने उस व्यक्ति  को फोन किया जिन्होंने कल उन्हैं यह प्रस्ताव दिया था, और उनसे कहने लगे -- हमारे घर वाले सभी सहमत हैं, आप तो इस रिश्ते के लिए हां कह दीजिए, हम कल जाकर उनसे मिलकर आयेंगे।

             अब जो मध्य का  व्यक्ति था, वह भी प्रसन्न होकर  कहने लगा -- सामने वालों ने भी प्रस्ताव स्वीकार कर लिया है, आप कल शाम के समय अपनी बेटी को मिलाकर आइएगा। इस प्रकार एक दूसरे से मिलने के लिए कल का समय निश्चित हो गया।
            अब श्रीमान जी रात्रि को अपने घर आये, घर आकर अपनी बेटी से कहा -- कल शाम के समय हमें लड़के को देखने चलना है। अब बेटी का मन थोड़ा उदास था, पिताजी ने पूछा‌‌ -- बेटी,  क्या हुआ ?
            बेटी कहने लगी -- पता नहीं पिताजी !! आप बहुत जल्दी कर रहे हैं, मुझे लगता है भोलेनाथ ऐसा कह रहे हैं कि किसी भी कार्य को करने से पहले जानकारी अवश्य लेनी चाहिए। तब पिताजी कहने लगे -- बेटी !! चिंता की बात नहीं है, परिवार अच्छा है, कुछ भी जांच करने की आवश्यकता नहीं है।

            बेटी ने पुनः कहा -- दो - तीन दिन रूक जाते हैं, एक बार उनके बारे में, उनके व्यवहार, बर्ताव के बारे में पता कर लेते हैं  फिर आगे बढ़ेंगे। बेटी की बात सुन पिताजी को थोड़ा गुस्सा आ गया, गुस्से में झुंझलाते हुए कहने लगे हर काम में तुमको यही बातें होती हैं, कभी तो तुम खुद मना कर देती हो और कभी कुछ ऐसा नाटक कर देती हो जो रिश्ते की बात ही खत्म हो जाती है।
                बेटी उदास होकर अपने कमरे में चली गई। प्रातः काल हुआ, श्रीमान जी रोज की तरह अपनी दुकान पहुँचे, दुकान पर शिवजी की पूजा कर रहे थे। तभी एक नौजवान सुंदर सा लड़का उनकी दुकान पर आया और कहने लगा -- श्रीमानजी ठीक हो !! 
इन्होने कहा -- हाँ ठीक हूँ।
नौजवान बोलने लगा --  श्रीमानजी आपकी बेटी के विवाह की तैयारियां चल रही हैं, मैंने सुना है आज आप पड़ोस के लड़के को देखने जा रहे हो। ऐसा सुनकर वह मन में विचार करने लगा यह बात तो मैंने किसी से कही नहीं है। इसे कैसे पता चल गया ?
            
            तब श्रीमानजी ने उससे पूछा -- तुम कौन हो और तुम्है यह बात किसने बताई ? तब वह नौजवान हंसते हुए कहने लगा -- मेरा नाम महेश है, मैं आपके पुत्र का दोस्त हूं, कल उसने ही मुझे सारी बात फोन पर बतायी थी, तब उसकी यह बात सुनकर उन्है कुछ थोड़ी राहत मिली। पुनः उससे पूछा कि तुम जानते हो जिनसे हम मिलने जा रहे हैं। तब  महेश कहने लगा श्रीमानजी  सच्ची बात तो यह है कि वह परिवार दिखने में तो थोड़ा अच्छा है पर उनके ऊपर कुछ अपराधिक केस भी चल रहे हैं, देखने की तो बातें अलग है, पर जो सच्चाई है वह बिलकुल अलग है।उनके परिवार के ऊपर थोड़ा कर्जा भी चढ़ा हुआ है और लड़का जितना शुशील दिखता है उतना है नहीं।

            अब महेश की ऐसी बातें सुनकर उनका मन भयभीत होने लगा, तब उन्होने बोला -- तुम क्या कहना चाहते हो ? तब  महेश कहने लगा -- मेरा तो यही विचार है कि आप इस रिश्ते को समाप्त कर दो। तब फिर उन्होने कहा फिर दूसरा रिश्ता कहां से आएगा ??
            तब वह हंसते हुए कहने लगा -- आपकी बेटी तो भगवान शंकर को मानती है ना, वही उसका रिश्ता करा देंगे, आप क्यों चिंता करते हो, इस प्रकार वह हंसते हुए बातें कर उनकी दुकान से बाहर चला गया। थोड़ी देर बाद जब उनका पुत्र दुकान पर आया। 
            पुत्र ने अपने पिताजी को दुखी देखकर पूछा - पिताजी क्या हुआ ? तब पिताजी ने उसे सारी बात बता कर कहा -- तुम्हारा दोस्त आया था, वह मुझसे कह कर गया, जिस लड़के को तुम देखने जा रहे हो वह अच्छा नहीं है।तब बेटा पूछने लगा -- मेरा कौन सा दोस्त आया था और मैंने तो किसी दोस्त से कोई बात नहीं की है। तब पिताजी हैरान होकर कहने लगे -- वह अपना नाम महेश बता रहा था और उसने मुझसे इतने अच्छे ढंग से बात की कि मैंने सामने वाले परिवार वालों को फोन करके कह दिया -- कि अभी हम रिश्ते के लिए तैयार नहीं है। थोड़े दिनों बाद जब हमें बात अच्छी लगेगी तब हम तुम्है बता देंगे।

            बेटा पुनः पूछने लगा --- पिताजी कौन  आया था ?? तब उसकी बातें सुनकर पिताजी को थोड़ा संकोच हो गया। वह रात्रि के समय अपने घर आये और अपनी बेटी से कहा -- बेटी, आज कोई लड़का मेरे पास आया था।  उसने मुझे कहा  कि जिन परिवार वालों से तुम बेटी का रिश्ता जोड़ना चाह रहे हो उनके विषय में जानकारी अवश्य निकला दो। उनके ऊपर थोड़े अपराधिक केस भी हैं।
            आज महेश की बात मानकर मैं जिन परिवार वालों से तुम्हारा रिश्ता जोड़ना चाहता था उनकी जानकारी निकलायी। जब मैंने आसपास के पड़ोस वालों से जानकारी प्राप्त की तो सुनकर हैरान हो गया, हकीकत में उनके ऊपर तो कई अपराधिक केस थे, पैसों का कर्जा भी उनके ऊपर चढ़ा हुआ था।
            अब महेश की बात सुनकर उन्है बड़ी हैरानी हो गई। वह बताना चाहते थे, पता नहीं वह कौन  नौजवान था जो उन्है तुम्हारे विषय में सचेत करके चला गया।
            तब बेटी हंसते हुए कहने लगी -- पिताजी आप उसे पहचान ही नहीं पाए, वह और कोई नहीं महेश का अर्थ होता है, जो भगवान सर्वोच्च हैं, जिनका सभी में सबसे ऊँचा स्थान है।
            महेश का अर्थ होता है -- भगवान शंकर,  शिवजी। वह भगवान शंकर ही नौजवान का रूप बना मेरा भला करके गये। अपनी बेटी की यह बात सुनकर पिताजी को बड़ी हैरानी हो गई, आज भी जब उनको वह बात याद आती है, तो उनकी आंखें आंसुओं से भर आती हैं।

            तो किस प्रकार भगवान अपने भक्तों की लाज रखते हैं, किस प्रकार उस बेटी का परमात्मा ने स्वयं आकर कल्याण किया, इस सच्ची घटना के माध्यम से आप सभी ने जाना।

 

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